असीं तेरे तों बगैर जीणा सिक्खया नहीं ,
साड्डी कुंडली च होर दर लिखया नहीं ,
तेरे बच्चेयां दा दिल हुण नहियों लग्गदा ,
हुण छेती सानुं दर ते बुला दाती,
अपने बच्चेयां नूँ चिठ्ठीयां पा दाती,
1. तेरा बच्चेयां दे बिना दिल किवें लग्गदा ,
तेरा द्वारा बच्चेयां दे बिन किवें सज्जदा ,
तेरे बच्चे करदे अरजां दाती ,
अपने बच्चेयां नूँ चिठ्ठीयां पा दाती
2. तूँ गुफा विच कल्ली,असीं घरां विच कल्ले आं ,
हुण तक मायें तेरे लाड्डां नाल पले आं
थोड़ा लाड़ सानुं फेर तूँ लडा दाती ,
अपने बच्चेयां नूँ चिठ्ठीयां पा दाती ,
3. दिल साड्डा हो गया बडा ही ऊचाट माँ ,
कदों खुल्लने तेरे मन्दरां दे कपाट माँ ,
बुहे खोल ,सानुं दर्श दिखा दाती ,
अपने बच्चेयां नूँ चिठ्ठीयां पा दाती ,
4. घर बैठे बैठे असीं होये बेचैन माँ,
तेरा ही नाम जपदे दिन और रैन माँ ,
चंचल ते रैम्पी नूँ चरणी ला दाती ,
अपने बच्चेयां नूँ चिठ्ठियां पा दाती !
जय माता दी 22/04/20(12.42 रात्रि) रैम्पी साज़
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असीं तेरे तों बगैर जीणा सिक्खया नहीं ,
साड्डी कुंडली च होर दर लिखया नहीं ,
तेरे बच्चेयां दा दिल हुण नहियों लग्गदा ,
हुण छेती सानुं दर ते बुला दाती,
अपने बच्चेयां नूँ चिठ्ठीयां पा दाती,
1. तेरा बच्चेयां दे बिना दिल किवें लग्गदा ,
तेरा द्वारा बच्चेयां दे बिन किवें सज्जदा ,
तेरे बच्चे करदे अरजां दाती ,
अपने बच्चेयां नूँ चिठ्ठीयां पा दाती
2. तूँ गुफा विच कल्ली,असीं घरां विच कल्ले आं ,
हुण तक मायें तेरे लाड्डां नाल पले आं
थोड़ा लाड़ सानुं फेर तूँ लडा दाती ,
अपने बच्चेयां नूँ चिठ्ठीयां पा दाती ,
3. दिल साड्डा हो गया बडा ही ऊचाट माँ ,
कदों खुल्लने तेरे मन्दरां दे कपाट माँ ,
बुहे खोल ,सानुं दर्श दिखा दाती ,
अपने बच्चेयां नूँ चिठ्ठीयां पा दाती ,
4. घर बैठे बैठे असीं होये बेचैन माँ,
तेरा ही नाम जपदे दिन और रैन माँ ,
चंचल ते रैम्पी नूँ चरणी ला दाती ,
अपने बच्चेयां नूँ चिठ्ठियां पा दाती !
जय माता दी 22/04/20(12.42 रात्रि) रैम्पी साज़बारम्बार प्रणाम, मैया बारम्बार प्रणाम...
जो नहीं ध्यावे तुम्हें अम्बिके, कहां उसे विश्राम।
अन्नपूर्णा देवी नाम तिहारो, लेत होत सब काम॥ बारम्बार...
प्रलय युगान्तर और जन्मान्तर, कालान्तर तक नाम।
सुर सुरों की रचना करती, कहाँ कृष्ण कहाँ राम॥ बारम्बार...
चूमहि चरण चतुर चतुरानन, चारु चक्रधर श्याम।
चंद्रचूड़ चन्द्रानन चाकर, शोभा लखहि ललाम॥ बारम्बार...
देवि देव! दयनीय दशा में दया-दया तब नाम।
त्राहि-त्राहि शरणागत वत्सल शरण रूप तब धाम॥ बारम्बार...
श्रीं, ह्रीं श्रद्धा श्री ऐ विद्या श्री क्लीं कमला काम।
कांति, भ्रांतिमयी, कांति शांतिमयी, वर दे तू निष्काम॥ बारम्बार...
बजरंग दया करके मुझको अपना लेना |
मैं शरण पड़ा तेरी, चरणों में जगह देना ||
करूणानिधि नाम तेरा, करुणा दिखलाओ तुम |
सोये हुए भावों को हे नाथ जगाओ तुम |
मेरी नावं भवर डोले, उसे पार लगा देना ||
...... बजरंग दया करके .......
तुम सुख के सागर हो, निर्धन के सहारे हो |
इस तन में समाये हो, प्राणों से प्यारे हो |
नित माला जपूँ तेरी, मुझको न भुला देना ||
...... बजरंग दया करके .......
पापी हूँ या कपटी हूँ, जैसा भी हूँ तेरा हूँ |
घर-बार छोड़ कर मैं, जीवन से खेला हूँ |
दुःख का मैं मारा हूँ, मेरे दुःख दर्द मिटा देना ||
...... बजरंग दया करके .......
मैं सबका सेवक हूँ, तेरे चरणों का चेरा (दास) हूँ |
नहीं नाथ भुला देना, इस जग में अकेला हूँ |
तेरे दर का भिखारी हूँ, मेरे दोष मिटा देना ||
...... बजरंग दया करके .......
तर्ज( उड़े जब जब)
मेरा श्याम बड़ा रंगीला,
मस्तियाँ बरसेगी-2, कीर्तन में,
रंगीलो मेरा बाबो श्याम ।। टेर ।।
कोई श्याम को रिझाकर देखे,
उमरिया सुधरेगी-2, कीर्तन में ।। 1 ।।
कोई श्याम को सजाकर देखे,
कि खुशबू महकेगी-2, कीर्तन में ।। 2 ।।
कोई अँखिया लड़ाकर देखे,
कि धड़कन मचलेगी-2, कीर्तन में।। 3 ।।
कोई श्याम को नचाकर देखे,
मुरलिया गुंजेगी-2, कीर्तन में ।। 4 ।।
‘नन्दू’ चलो भजन सुणावाँ,
उमरिया सुधरेगी-2, कीर्तन में।। 5 ।।
मेरा श्याम बड़ा रंगीला,
मस्तियाँ बरसेगी-2, कीर्तन में,
रंगीलो मेरा बाबो श्याम ।। टेर ।।
कोई श्याम को रिझाकर देखे,
उमरिया सुधरेगी-2, कीर्तन में ।। 1 ।।
कोई श्याम को सजाकर देखे,
कि खुशबू महकेगी-2, कीर्तन में ।। 2 ।।
कोई अँखिया लड़ाकर देखे,
कि धड़कन मचलेगी-2, कीर्तन में।। 3 ।।
कोई श्याम को नचाकर देखे,
मुरलिया गुंजेगी-2, कीर्तन में ।। 4 ।।
‘नन्दू’ चलो भजन सुणावाँ,
उमरिया सुधरेगी-2, कीर्तन में।। 5 ।।
ॐ जय श्री श्याम हरे बाबा जय श्री श्याम हरे |
खाटू धाम विराजत अनुपम रूप धरे॥ ॐ जय श्री श्याम हरे....
रत्न जड़ित सिंहासन सिर पर चंवर ढुले |
तन केशरिया बागों कुण्डल श्रवण पडे॥ ॐ जय श्री श्याम हरे....
गल पुष्पों की माला सिर पर मुकुट धरे |
खेवत धूप अग्नि पर दिपक ज्योती जले॥ ॐ जय श्री श्याम हरे....
मोदक खीर चुरमा सुवरण थाल भरें |
सेवक भोग लगावत सेवा नित्य करें॥ ॐ जय श्री श्याम हरे....
झांझ कटोरा और घसियावल शंख मृंदग धरे |
भक्त आरती गावे जय जयकार करें॥ ॐ जय श्री श्याम हरे....
जो ध्यावे फल पावे सब दुःख से उबरे |
सेवक जन निज मुख से श्री श्याम श्याम उचरें॥ ॐ जय श्री श्याम हरे....
श्री श्याम बिहारी जी की आरती जो कोई नर गावे |
कहत मनोहर स्वामी मनवांछित फल पावें॥ ॐ जय श्री श्याम हरे....
ॐ जय श्री श्याम हरे बाबा जय श्री श्याम हरे |
निज भक्तों के तुम ने पूर्ण काज करें॥ ॐ जय श्री श्याम हरे....
ॐ जय श्री श्याम हरे बाबा जय श्री श्याम हरे |
खाटू धाम विराजत अनुपम रूप धरे॥ ॐ जय श्री श्याम हरे....
खाटू धाम विराजत अनुपम रूप धरे॥ ॐ जय श्री श्याम हरे....
रत्न जड़ित सिंहासन सिर पर चंवर ढुले |
तन केशरिया बागों कुण्डल श्रवण पडे॥ ॐ जय श्री श्याम हरे....
गल पुष्पों की माला सिर पर मुकुट धरे |
खेवत धूप अग्नि पर दिपक ज्योती जले॥ ॐ जय श्री श्याम हरे....
मोदक खीर चुरमा सुवरण थाल भरें |
सेवक भोग लगावत सेवा नित्य करें॥ ॐ जय श्री श्याम हरे....
झांझ कटोरा और घसियावल शंख मृंदग धरे |
भक्त आरती गावे जय जयकार करें॥ ॐ जय श्री श्याम हरे....
जो ध्यावे फल पावे सब दुःख से उबरे |
सेवक जन निज मुख से श्री श्याम श्याम उचरें॥ ॐ जय श्री श्याम हरे....
श्री श्याम बिहारी जी की आरती जो कोई नर गावे |
कहत मनोहर स्वामी मनवांछित फल पावें॥ ॐ जय श्री श्याम हरे....
ॐ जय श्री श्याम हरे बाबा जय श्री श्याम हरे |
निज भक्तों के तुम ने पूर्ण काज करें॥ ॐ जय श्री श्याम हरे....
ॐ जय श्री श्याम हरे बाबा जय श्री श्याम हरे |
खाटू धाम विराजत अनुपम रूप धरे॥ ॐ जय श्री श्याम हरे....
महाबली भीम और हिडिम्बा के पुत्र वीर घटोत्कच ने शास्त्रार्थ प्रतियोगिता जीतकर राजा मूर की पुत्री, कामकटंकटा (“मौर्वी”) से विवाह किया| उन्होंने एक वीर पुत्र को जन्म दिया जिसके केश बब्बर शेर की तरह दिखते थे| अतः उनका नाम बर्बरीक रखा गया|
आज उन ही वीर बर्बरीक को हम खाटू श्याम बाबा के “श्री श्याम”, “कलयुग के आवतार”, “श्याम सरकार”, “तीन बाणधारी”, “शीश के दानी”, “खाटू नरेश” तथा अन्य अनगिनत नामों से संबोधित करते हैं|
जब विद्वान बर्बरीक ने भगवान श्री कृष्ण से पूछा – “हे प्रभु! इस जीवन का सर्वोतम उपयोग क्या है?” इस कोमल एवं निश्छल हृदय से पूछे गए प्रश्न का उत्तर देते हुए श्री कृष्ण बोले – “हे पुत्र, इस जीवन का सर्वोत्तम उपयोग: परोपकार व निर्बल का साथी बनकर सदैव धर्म का साथ देने से है| इसके लिये तुम्हे बल एवं शक्तियाँ अर्जित करनी पड़ेगी| अत: तुम महीसागर क्षेत्र में नव दुर्गा की आराधना कर शक्तियाँ अर्जन करो|” श्री कृष्ण ने बर्बरीक का निश्चल एवं कोमल हृदय देखकर उन्हें “सुहृदय” नाम से अलंकृत किया|
बर्कारिक ने ३ वर्ष तक सच्ची श्रधा और निष्ठा के साथ नवदुर्गा की आराधना की और प्रसन्न होकर माँ दुर्गा ने बर्बरीक को तीन बाण और कई शक्तियाँ प्रदान की जिनसे तीनो लोको को जीता जा सकता था| तत्पश्चात माँ जगदम्बा ने उन्हें “चण्डील” नाम से संबोधित किया|
जब वीर बर्बरीक ने अपने माँ से महाभारत के युद्ध में हिस्सा लेने की इच्छा व्यक्त की, तब माता मोर्वी ने उनसे हारने वाले पक्ष का साथ देने का वचन लिया और युद्ध में भाग लेने की आज्ञा दी| भगवान श्री कृष्ण जानते थे की कौरवो की सेना हार रही थी| अपनी माता के आज्ञा के अनुसार महाबली बर्बरीक पाण्डव के विपक्ष में युद्ध करेंगे जिससे पाण्डवो की हार निश्चित हो जाएगी| इस अनहोनी को रोकने के लिए श्री कृष्ण ने बर्बरीक को रोका, उनकी परीक्षा ली और अपने सुदर्शन चक्र से उनका सर धड़ से अलग कर दिया|
सुदर्शन चक्र से शीश काटने के बाद माँ चण्डिका देवी ने वीर बर्बरीक के शीश को अमृत से सींच कर देवत्व प्रदान किया| तब इस नविन जाग्रत शीश ने उन सबको प्रणाम किया और कहा -”मैं युद्ध देखना चाहता हूँ| आप लोग इसकी स्वीकृति दीजिए|” श्री कृष्ण बोले – “हे वत्स! जब तक यह पृथ्वी नक्षत्र सहित है और जब तक सूर्य चन्द्रमा है, तब तक तुम सब लोगो के लिए पूजनीय होओगे| तुम सैदव देवियों के स्थानों में देवियों के समान विचरते रहोगे और अपने भक्तगणों के समुदाय में कुल देवियो की मर्यादा जैसी है, वैसी ही बनाई रखोगे और पर्वत की चोटी पर से युद्ध देखो|” इस प्रकार भगवान कृष्ण ने उस शीश को कलयुग में देव रूप में पूजे जाने और अपने भक्तों की मनोकामना पूर्ण करने का वरदान दिया| महाभारत युद्ध की समाप्ति पर महाबली श्री भीमसेन को अभिमान हो गया कि युद्ध केवल उनके पराक्रम से जीता गया है| अर्जुन ने कहा कि वीर बर्बरीक के शीश से पूछा जाये की उसने इस युद्ध में किसका पराक्रम देखा है| तब वीर बर्बरीक के शीश ने उत्तर दिया की यह युद्ध केवल भगवान श्रीकृष्ण की निति के कारण जीता गया| इस युद्ध में केवल भगवान श्रीकृष्ण का सुदर्शन चक्र चलता था, अन्यत्र कुछ भी नहीं था| भगवान श्रीकृष्ण ने पुनः वीर बर्बरीक के शीश को प्रणाम करते हुए कहा – “हे वीर बर्बरीक आप कलियुग में सर्वत्र पूजित होकर अपने सभी भक्तो के अभीष्ट कार्य को पूर्ण करोगे|” ऐसा कहने पर समस्त नभ मंडल उद्भाषित हो उठा एवं बाबा श्याम के देव स्वरुप शीश पर पुष्प की वर्षा होने लगी|
आज उन ही वीर बर्बरीक को हम खाटू श्याम बाबा के “श्री श्याम”, “कलयुग के आवतार”, “श्याम सरकार”, “तीन बाणधारी”, “शीश के दानी”, “खाटू नरेश” तथा अन्य अनगिनत नामों से संबोधित करते हैं|
जब विद्वान बर्बरीक ने भगवान श्री कृष्ण से पूछा – “हे प्रभु! इस जीवन का सर्वोतम उपयोग क्या है?” इस कोमल एवं निश्छल हृदय से पूछे गए प्रश्न का उत्तर देते हुए श्री कृष्ण बोले – “हे पुत्र, इस जीवन का सर्वोत्तम उपयोग: परोपकार व निर्बल का साथी बनकर सदैव धर्म का साथ देने से है| इसके लिये तुम्हे बल एवं शक्तियाँ अर्जित करनी पड़ेगी| अत: तुम महीसागर क्षेत्र में नव दुर्गा की आराधना कर शक्तियाँ अर्जन करो|” श्री कृष्ण ने बर्बरीक का निश्चल एवं कोमल हृदय देखकर उन्हें “सुहृदय” नाम से अलंकृत किया|
बर्कारिक ने ३ वर्ष तक सच्ची श्रधा और निष्ठा के साथ नवदुर्गा की आराधना की और प्रसन्न होकर माँ दुर्गा ने बर्बरीक को तीन बाण और कई शक्तियाँ प्रदान की जिनसे तीनो लोको को जीता जा सकता था| तत्पश्चात माँ जगदम्बा ने उन्हें “चण्डील” नाम से संबोधित किया|
जब वीर बर्बरीक ने अपने माँ से महाभारत के युद्ध में हिस्सा लेने की इच्छा व्यक्त की, तब माता मोर्वी ने उनसे हारने वाले पक्ष का साथ देने का वचन लिया और युद्ध में भाग लेने की आज्ञा दी| भगवान श्री कृष्ण जानते थे की कौरवो की सेना हार रही थी| अपनी माता के आज्ञा के अनुसार महाबली बर्बरीक पाण्डव के विपक्ष में युद्ध करेंगे जिससे पाण्डवो की हार निश्चित हो जाएगी| इस अनहोनी को रोकने के लिए श्री कृष्ण ने बर्बरीक को रोका, उनकी परीक्षा ली और अपने सुदर्शन चक्र से उनका सर धड़ से अलग कर दिया|
सुदर्शन चक्र से शीश काटने के बाद माँ चण्डिका देवी ने वीर बर्बरीक के शीश को अमृत से सींच कर देवत्व प्रदान किया| तब इस नविन जाग्रत शीश ने उन सबको प्रणाम किया और कहा -”मैं युद्ध देखना चाहता हूँ| आप लोग इसकी स्वीकृति दीजिए|” श्री कृष्ण बोले – “हे वत्स! जब तक यह पृथ्वी नक्षत्र सहित है और जब तक सूर्य चन्द्रमा है, तब तक तुम सब लोगो के लिए पूजनीय होओगे| तुम सैदव देवियों के स्थानों में देवियों के समान विचरते रहोगे और अपने भक्तगणों के समुदाय में कुल देवियो की मर्यादा जैसी है, वैसी ही बनाई रखोगे और पर्वत की चोटी पर से युद्ध देखो|” इस प्रकार भगवान कृष्ण ने उस शीश को कलयुग में देव रूप में पूजे जाने और अपने भक्तों की मनोकामना पूर्ण करने का वरदान दिया| महाभारत युद्ध की समाप्ति पर महाबली श्री भीमसेन को अभिमान हो गया कि युद्ध केवल उनके पराक्रम से जीता गया है| अर्जुन ने कहा कि वीर बर्बरीक के शीश से पूछा जाये की उसने इस युद्ध में किसका पराक्रम देखा है| तब वीर बर्बरीक के शीश ने उत्तर दिया की यह युद्ध केवल भगवान श्रीकृष्ण की निति के कारण जीता गया| इस युद्ध में केवल भगवान श्रीकृष्ण का सुदर्शन चक्र चलता था, अन्यत्र कुछ भी नहीं था| भगवान श्रीकृष्ण ने पुनः वीर बर्बरीक के शीश को प्रणाम करते हुए कहा – “हे वीर बर्बरीक आप कलियुग में सर्वत्र पूजित होकर अपने सभी भक्तो के अभीष्ट कार्य को पूर्ण करोगे|” ऐसा कहने पर समस्त नभ मंडल उद्भाषित हो उठा एवं बाबा श्याम के देव स्वरुप शीश पर पुष्प की वर्षा होने लगी|
आना खाटू श्याम हमारे मन मंदिर में
पाप को हटाना प्रभु क्रोध को हटाना
सत्य की पौध लगाना हमारे मन मंदिर में
आना खाटू श्याम ...............
अहंकार को खोना प्रभु प्रेम को बोना
शीतल गंगा बहाना हमारे मन मंदिर में
आना खाटू श्याम ...............
भाव जगाना प्रभु भक्ति को सिखाना
सत्य की राह दिखाना हमारे मन मंदिर में
आना खाटू श्याम ...............
श्याम जी गुरुवर मेरे देर न करना दास को तुम्हारे चरणों में रखना
सत्य की राह दिखाना प्रभु जी मन मंदिर में
आना खाटू श्याम ...............
पाप को हटाना प्रभु क्रोध को हटाना
सत्य की पौध लगाना हमारे मन मंदिर में
आना खाटू श्याम ...............
अहंकार को खोना प्रभु प्रेम को बोना
शीतल गंगा बहाना हमारे मन मंदिर में
आना खाटू श्याम ...............
भाव जगाना प्रभु भक्ति को सिखाना
सत्य की राह दिखाना हमारे मन मंदिर में
आना खाटू श्याम ...............
श्याम जी गुरुवर मेरे देर न करना दास को तुम्हारे चरणों में रखना
सत्य की राह दिखाना प्रभु जी मन मंदिर में
आना खाटू श्याम ...............
खाटू वाले श्याम बाबा तेरा ही सहारा-1
तेरे सिवा दुनिया में कोई न हमारा – 11
लाख्दातर तू हैं एक जाने जग सारा -1
खाटू वाले श्याम बाबा तेरा ही सहारा –11
बड़े ही दयालु …… तेरी महिमा है भरी-1
दर्शन को आये तेरे लाखो नरनारी – 11
पतित उठारण नाम है तिहरा-1
तेरे सिवा दुनिया में कोई न हमारा –11
खाटू वाले श्याम बाबा तेरा ही सहारा-1
तेरे सिवा दुनिया में कोई न हमारा – 11
पता न ठिकाना …… जानू कहाँ तुझे पाऊ-1
भक्ति न भाव जानू कैसे में रिझाऊँ -11
तेरे सिवा दुनिया में कोई न हमारा – 11
लाख्दातर तू हैं एक जाने जग सारा -1
खाटू वाले श्याम बाबा तेरा ही सहारा –11
बड़े ही दयालु …… तेरी महिमा है भरी-1
दर्शन को आये तेरे लाखो नरनारी – 11
पतित उठारण नाम है तिहरा-1
तेरे सिवा दुनिया में कोई न हमारा –11
खाटू वाले श्याम बाबा तेरा ही सहारा-1
तेरे सिवा दुनिया में कोई न हमारा – 11
पता न ठिकाना …… जानू कहाँ तुझे पाऊ-1
भक्ति न भाव जानू कैसे में रिझाऊँ -11
हमको मनकी शक्ति देना, मन विजय करें .
दूसरोंकी जयसे पहले, खुदकी जय करें .
हमको मनकी शक्ति देना ..
भेदभाव अपने दिलसे, साफ कर सकें .
दूसरोंसे भूल हो तो, माफ कर सकें .
झूठसे बचे रहें, सचका दम भरें .
दूसरोंकी जयसे पहले,
मुश्किलें पडें तो हमपे, इतना कर्म कर .
साथ दें तो धर्मका, चलें तो धर्म पर .
खुदपे हौसला रहे, सचका दम भरें .
दूसरोंकी जयसे पहले,
मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई
जाके सिर मोर मुकुट मेरो पति सोई
तात मात भ्रात बंधु आपनो न कोई
छांड़ी दई कुलकी कानि कहा करिहै कोई
संतन ढिग बैठि बैठि लोक लाज खोई
चुनरी के किये टूक ओढ़ लीन्ही लोई
मोती मूंगे उतार बनमाला पोई
अंसुवन जल सीचि सीचि प्रेम बेलि बोई
अब तो बेल फैल गई आंनद फल होई
दूध की मथनियां बड़े प्रेम से बिलोई
माखन जब काढ़ि लियो छाछ पिये कोई
भगति देखि राजी हुई जगत देखि रोई
दासी मीरा लाल गिरधर तारो अब मोही
कभी राम बनके कभी श्याम बनके
चले आना प्रभुजी चले आना....
तुम राम रूप में आना, तुम राम रूप में आना
सीता साथ लेके, धनुष हाथ लेके,
चले आना प्रभुजी चले आना...
तुम श्याम रूप में आना, तुम श्याम रूप में आना,
राधा साथ लेके, मुरली हाथ लेके,
चले आना प्रभुजी चले आना...
तुम शिव के रूप में आना, तुम शिव के रूप में आना..
गौरा साथ लेके , डमरू हाथ लेके,
चले आना प्रभुजी चले आना...
तुम विष्णु रूप में आना, तुम विष्णु रूप में आना,
लक्ष्मी साथ लेके, चक्र हाथ लेके,
चले आना प्रभुजी चले आना...
तुम गणपति रूप में आना, तुम गणपति रूप में आना
रिद्धि साथ लेके, सिद्धि साथ लेके ,
चले आना प्रभुजी चले आना....
कभी राम बनके कभी श्याम बनके
चले आना प्रभुजी चले आना...
होली वसंत ऋतु में मनाया जाने वाला एक महत्वपूर्ण भारतीय त्योहार है। यह पर्व हिंदू पंचांग के अनुसार फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। रंगों का त्योहार कहा जाने वाला यह पर्व पारंपरिक रूप से दो दिन मनाया जाता है। पहले दिन को होलिका जलायी जाती है, जिसे होलिका दहन भी कहते है। दूसरे दिन, जिसे धुरड्डी, धुलेंडी, धुरखेल या धूलिवंदन कहा जाता है, लोग एक दूसरे पर रंग, अबीर-गुलाल इत्यादि फेंकते हैं, ढोल बजा कर होली के गीत गाये जाते हैं, और घर-घर जा कर लोगों को रंग लगाया जाता है। ऐसा माना जाता है कि होली के दिन लोग पुरानी कटुता को भूल कर गले मिलते हैं और फिर से दोस्त बन जाते हैं। एक दूसरे को रंगने और गाने-बजाने का दौर दोपहर तक चलता है। इसके बाद स्नान कर के विश्राम करने के बाद नए कपड़े पहन कर शाम को लोग एक दूसरे के घर मिलने जाते हैं, गले मिलते हैं और मिठाइयाँ खिलाते हैं। राग-रंग का यह लोकप्रिय पर्व वसंत का संदेशवाहक भी है। राग अर्थात संगीत और रंग तो इसके प्रमुख अंग हैं ही, पर इनको उत्कर्ष तक पहुँचाने वाली प्रकृति भी इस समय रंग-बिरंगे यौवन के साथ अपनी चरम अवस्था पर होती है। फाल्गुन माह में मनाए जाने के कारण इसे फाल्गुनी भी कहते हैं। होली का त्योहार वसंत पंचमी से ही आरंभ हो जाता है। उसी दिन पहली बार गुलाल उड़ाया जाता है। इस दिन से फाग और धमार का गाना प्रारंभ हो जाता है। खेतों में सरसों खिल उठती है। बाग-बगीचों में फूलों की आकर्षक छटा छा जाती है। पेड़-पौधे, पशु-पक्षी और मनुष्य सब उल्लास से परिपूर्ण हो जाते हैं। खेतों में गेहूँ की बालियाँ इठलाने लगती हैं। किसानों का ह्रदय ख़ुशी से नाच उठता है। बच्चे-बूढ़े सभी व्यक्ति सब कुछ संकोच और रूढ़ियाँ भूलकर ढोलक-झाँझ-मंजीरों की धुन के साथ नृत्य-संगीत व रंगों में डूब जाते हैं। चारों तरफ़ रंगों की फुहार फूट पड़ती है। होली के दिन आम्र मंजरी तथा चंदन को मिलाकर खाने का बड़ा माहात्म्य है।
भगवान नृसिंह द्वारा हिरण्यकशिपु का वध
होली के पर्व से अनेक कहानियाँ जुड़ी हुई हैं। इनमें से सबसे प्रसिद्ध कहानी है प्रह्लाद की। माना जाता है कि प्राचीन काल में हिरण्यकशिपु नाम का एक अत्यंत बलशाली असुर था। अपने बल के दर्प में वह स्वयं को ही ईश्वर मानने लगा था। उसने अपने राज्य में ईश्वर का नाम लेने पर ही पाबंदी लगा दी थी। हिरण्यकशिपु का पुत्र प्रह्लाद ईश्वर भक्त था। प्रह्लाद की ईश्वर भक्ति से क्रुद्ध होकर हिरण्यकशिपु ने उसे अनेक कठोर दंड दिए, परंतु उसने ईश्वर की भक्ति का मार्ग न छोड़ा। हिरण्यकशिपु की बहन होलिका को वरदान प्राप्त था कि वह आग में भस्म नहीं हो सकती। हिरण्यकशिपु ने आदेश दिया कि होलिका प्रह्लाद को गोद में लेकर आग में बैठे। आग में बैठने पर होलिका तो जल गई, पर प्रह्लाद बच गया। ईश्वर भक्त प्रह्लाद की याद में इस दिन होली जलाई जाती है। प्रतीक रूप से यह भी माना जता है कि प्रह्लाद का अर्थ आनन्द होता है। वैर और उत्पीड़न की प्रतीक होलिका (जलाने की लकड़ी) जलती है और प्रेम तथा उल्लास का प्रतीक प्रह्लाद (आनंद) अक्षुण्ण रहता है।
भगवान नृसिंह द्वारा हिरण्यकशिपु का वध
होली के पर्व से अनेक कहानियाँ जुड़ी हुई हैं। इनमें से सबसे प्रसिद्ध कहानी है प्रह्लाद की। माना जाता है कि प्राचीन काल में हिरण्यकशिपु नाम का एक अत्यंत बलशाली असुर था। अपने बल के दर्प में वह स्वयं को ही ईश्वर मानने लगा था। उसने अपने राज्य में ईश्वर का नाम लेने पर ही पाबंदी लगा दी थी। हिरण्यकशिपु का पुत्र प्रह्लाद ईश्वर भक्त था। प्रह्लाद की ईश्वर भक्ति से क्रुद्ध होकर हिरण्यकशिपु ने उसे अनेक कठोर दंड दिए, परंतु उसने ईश्वर की भक्ति का मार्ग न छोड़ा। हिरण्यकशिपु की बहन होलिका को वरदान प्राप्त था कि वह आग में भस्म नहीं हो सकती। हिरण्यकशिपु ने आदेश दिया कि होलिका प्रह्लाद को गोद में लेकर आग में बैठे। आग में बैठने पर होलिका तो जल गई, पर प्रह्लाद बच गया। ईश्वर भक्त प्रह्लाद की याद में इस दिन होली जलाई जाती है। प्रतीक रूप से यह भी माना जता है कि प्रह्लाद का अर्थ आनन्द होता है। वैर और उत्पीड़न की प्रतीक होलिका (जलाने की लकड़ी) जलती है और प्रेम तथा उल्लास का प्रतीक प्रह्लाद (आनंद) अक्षुण्ण रहता है।
मौज मस्ती और खुशियां मनाने की पंजाबी संस्कृति की झलक हर साल तेरह जनवरी को मनाए जाने वाले लोहडी पर्व में पूरे शबाब पर दिखाई देती है। लोहडी का त्योहार पंजाब में ही नहीं बल्कि पडोसी हरियाणा,दिल्ली, हिमाचल प्रदेश और अन्य उत्तरी राज्यों में बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है। पंजाब में गेहूं की फसल अक्टूबर में बोई जाती है और मार्च में काटी जाती है। लोहडी पर्व तक यह पता चल जाता है कि फसल कैसी होगी इसलिए लोहडी के समय लोग उत्साह से भरे रहते हैं। पंजाब में लोहडी के दिन सरसों का साग, मक्के की रोटी तथा गन्ने के रस और चावल से बनी खीर बनाई जाती है। नृत्य पंजाब की संस्कृति का एक अहम हिस्सा होता है। लोहडी के दिन लोग खूब भांगडा करते हैं और शाम होते ही सूखी लकड़ियां जलाकर नाचते-गाते हैं। यह सिलसिला देर रात तक चलता है। ढोल की थाप पर थिरकते लोग रेवडी,मूंगफली का स्वाद लेते हुए नाचते-गाते हैं। लोहडी को लेकर युवाओं में कुछ अधिक ही उत्साह रहता है। युवक-युवतियां शाम होते ही सजधज कर अग्नि प्रज्ज्वलित करके नाचते-गाते हैं। इस दिन उन्हें नाचते-गाते हैं। उनकी खुशी देखते ही बनती है। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में भी लोहडी बडे उत्साह के साथ मनाई जाती है। दिल्ली में पंजाबी लोगों की अच्छी खासी तादाद है और इस पर्व को राजधानी में भी मौजमस्ती के साथ मनाया जाता है। केवल पंजाबी समुदाय के लोग ही नहीं बल्कि हर समुदाय के लोग इस पर्व को मनाते है और इसका पूरा लुत्फ उठाते है। लोहडी के दिन लकडियां प्रज्ज्वलित करके लोग उसके चारों और नाचते गाते और मूंगफली तथा गजक खाते हुए चक्कर लगाते हैं। लोहडी के दिन कुछ विशेष गीत भी गाये जाते है। इन गीतों में ये गीत भी शामिल है: सुन्दर मुन्द्ररिये हो तेरा कौन वेचारा हो। दुल्ला भट्टी वाला हो। दुल्ले धी बिआई हो सेर सकर पाई हो। लोहडी के दिन यह गीत भी खूब गाया जाता है देह माई लोहडी जीवे तेरी जोडी तेरे कोठे ऊपर मोर. रब्ब पुत्तर देवे होर साल नूं फेर आवां। लोहडी पर्व आग और सूर्य को समर्पित होता है। इस दौरान सूर्य मकर राशि से उत्तर की आ॓र आ जाता है। अग्नि देवता का आध्यात्मिक महत्व भी होता है। लोग पापकार्न,मूंगफली,रेवडी,गज्जक,मिठाइयां आदि प्रसाद के रूप में चढ़ात हैं। किसानों के लिए लोहडी का विशेष महत्व है। वे इसे रबी की फसल पकने की खुशी में मनाते है। इस अवसर पर अग्नि को नमन करते हुए किसान अच्छी फसल की कामना करते हैं।
कभी राम बनके कभी श्याम बनके
चले आना प्रभुजी चले आना....
तुम राम रूप में आना, तुम राम रूप में आना
सीता साथ लेके, धनुष हाथ लेके,
चले आना प्रभुजी चले आना...
तुम श्याम रूप में आना, तुम श्याम रूप में आना,
राधा साथ लेके, मुरली हाथ लेके,
चले आना प्रभुजी चले आना...
तुम शिव के रूप में आना, तुम शिव के रूप में आना..
गौरा साथ लेके , डमरू हाथ लेके,
चले आना प्रभुजी चले आना...
तुम विष्णु रूप में आना, तुम विष्णु रूप में आना,
लक्ष्मी साथ लेके, चक्र हाथ लेके,
चले आना प्रभुजी चले आना...
तुम गणपति रूप में आना, तुम गणपति रूप में आना
रिद्धि साथ लेके, सिद्धि साथ लेके ,
चले आना प्रभुजी चले आना....
कभी राम बनके कभी श्याम बनके
चले आना प्रभुजी चले आना...
नवरात्रि एक हिंदू पर्व है। नवरात्रि संस्कृत शब्द है, जिसका अर्थ होता है नौ रातें । यह पर्व साल में चार बार आता है।चैत्र,आषाढ,अश्विन,पोषप्रतिपदा से नवमी तक मनाया जाता है। नवरात्रि के नौ रातो में तीन देवियों - महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वतीया सरस्वतीकि तथा दुर्गा के नौ स्वरुपों की पूजा होती है जिन्हे नवदुर्गा कहते हैं ।
नौ देवियाँ है :-
श्री शैलपुत्री
श्री ब्रह्मचारिणी
श्री चंद्रघंटा
श्री कुष्मांडा
श्री स्कंदमाता
श्री कात्यायनी
श्री कालरात्रि
श्री महागौरी
श्री सिद्धिदात्री
शक्ति की उपासना का पर्व शारदेय नवरात्र प्रतिपदा से नवमी तक निश्चित नौ तिथि, नौ नक्षत्र, नौ शक्तियों की नवधा भक्ति के साथ सनातन काल से मनाया जा रहा है। सर्वप्रथम श्रीरामचंद्रजी ने इस शारदीय नवरात्रि पूजा का प्रारंभ समुद्र तट पर किया था और उसके बाद दसवें दिन लंका विजय के लिए प्रस्थान किया और विजय प्राप्त की । तब से असत्य, अधर्म पर सत्य, धर्म की जीत का पर्व दशहरा मनाया जाने लगा। आदिशक्ति के हर रूप की नवरात्र के नौ दिनों में क्रमशः अलग-अलग पूजा की जाती है। माँ दुर्गा की नौवीं शक्ति का नाम सिद्धिदात्री है। ये सभी प्रकार की सिद्धियाँ देने वाली हैं। इनका वाहन सिंह है और कमल पुष्प पर ही आसीन होती हैं । नवरात्रि के नौवें दिन इनकी उपासना की जाती है। नवदुर्गा और दस महाविधाओं में काली ही प्रथम प्रमुख हैं। भगवान शिव की शक्तियों में उग्र और सौम्य, दो रूपों में अनेक रूप धारण करने वाली दस महाविधाएँ अनंत सिद्धियाँ प्रदान करने में समर्थ हैं। दसवें स्थान पर कमला वैष्णवी शक्ति हैं, जो प्राकृतिक संपत्तियों की अधिष्ठात्री देवी लक्ष्मी हैं। देवता, मानव, दानव सभी इनकी कृपा के बिना पंगु हैं, इसलिए आगम-निगम दोनों में इनकी उपासना समान रूप से वर्णित है। सभी देवता, राक्षस, मनुष्य, गंधर्व इनकी कृपा-प्रसाद के लिए लालायित रहते हैं।
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