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 होली का नाम आते ही रंग, गुलाल और उत्साह की तस्वीर सामने आती है, लेकिन उत्तर प्रदेश के Varanasi में होली का एक ऐसा रूप भी है, जो पूरी दुनिया में अद्वितीय माना जाता है। यहां Manikarnika Ghat पर मनाई जाने वाली ‘मसान होली’ जीवन और मृत्यु के गहरे दर्शन को दर्शाती है।

मसान होली में लोग रंगों की जगह चिता की राख से होली खेलते हैं। ढोल-नगाड़ों की गूंज के बीच अघोरी साधु और स्थानीय श्रद्धालु भस्म उड़ाते हैं। सबसे अनोखा दृश्य तब होता है, जब जलती चिताओं के बीच नगरवधुएं नृत्य करती हैं। श्मशान, जिसे आमतौर पर शोक का स्थान माना जाता है, उस दिन उत्सव स्थल में बदल जाता है।

काशी को भगवान शिव की नगरी कहा जाता है। मान्यता है कि शिव स्वयं भूत-प्रेतों और अपने गणों के साथ श्मशान में विचरण करते हैं। मसान होली उसी शिव परंपरा से जुड़ी मानी जाती है, जहां मृत्यु को अंत नहीं, बल्कि मोक्ष का मार्ग माना जाता है। यहां राख से खेली जाने वाली होली यह संदेश देती है कि जीवन क्षणभंगुर है और अंततः सब भस्म में मिल जाना है।

नगरवधुओं का नृत्य भी इस परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसे सामाजिक बंधनों से मुक्ति और मोक्ष की कामना का प्रतीक माना जाता है। यह परंपरा बताती है कि मृत्यु के बाद सभी भेद समाप्त हो जाते हैं।

मसान होली केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि काशी की आध्यात्मिक आत्मा और सांस्कृतिक विरासत का जीवंत प्रतीक है, जिसे देखने हर साल हजारों लोग पहुंचते हैं।


 होलिका दहन का पर्व बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। मान्यता है कि इस दिन जलाई जाने वाली पवित्र अग्नि में नकारात्मकता, कष्ट और ग्रह दोष समर्पित करने से जीवन में सकारात्मक बदलाव आते हैं। कई लोग मेहनत के बावजूद सफलता नहीं मिलने, विवाह में देरी, नौकरी में रुकावट या आर्थिक समस्याओं से परेशान रहते हैं। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार होलिका दहन इन बाधाओं को दूर करने का शुभ अवसर माना जाता है।

ज्योतिषाचार्यों के मुताबिक वर्ष 2026 में 2 मार्च को होलिका दहन किया जाएगा। रात 11 बजकर 50 मिनट का समय विशेष रूप से शुभ बताया गया है (स्थानीय पंचांग के अनुसार समय में अंतर संभव है)। इस मुहूर्त में विधि-विधान से पूजा करने पर विशेष फल प्राप्त होता है।

होलिका पूजन के बाद अग्नि की 11 बार परिक्रमा करना शुभ माना गया है। परिक्रमा करते समय अपनी समस्याओं के समाधान की प्रार्थना करनी चाहिए। मान्यता है कि इससे ग्रह दोष शांत होते हैं और जीवन की बाधाएं धीरे-धीरे समाप्त होने लगती हैं।

अग्नि में नारियल, गुड़-चना, काले तिल, पीली सरसों और नई फसल की बालियां अर्पित करना शुभ माना जाता है। कहा जाता है कि इन वस्तुओं को समर्पित करने से आर्थिक कष्ट कम होते हैं, नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है और विवाह व करियर में आ रही अड़चनें समाप्त होती हैं।

होलिका दहन का संदेश केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हमें ईर्ष्या, क्रोध और अहंकार जैसी नकारात्मक भावनाओं को त्यागकर नई शुरुआत करने की प्रेरणा भी देता है। श्रद्धा और विश्वास के साथ किए गए उपाय मानसिक शांति और आत्मबल प्रदान करते हैं।


 सूर्य ग्रहण को हिंदू धर्म में एक महत्वपूर्ण खगोलीय और आध्यात्मिक घटना माना जाता है। मान्यता है कि ग्रहण के दौरान वातावरण में नकारात्मक ऊर्जा का प्रभाव बढ़ जाता है। इसलिए ग्रहण समाप्त होने के बाद शुद्धिकरण करना जरूरी बताया गया है। ज्योतिष और धार्मिक परंपराओं के अनुसार केवल स्नान करना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि कुछ अन्य उपाय भी किए जाने चाहिए।

ग्रहण खत्म होते ही सबसे पहले स्नान करना चाहिए। यदि संभव हो तो स्नान के पानी में गंगाजल मिलाएं। इससे शारीरिक और मानसिक शुद्धि मानी जाती है। इसके बाद घर की अच्छी तरह सफाई करें और गंगाजल का छिड़काव करें। खासकर पूजा स्थान को साफ कर दीपक जलाएं और भगवान सूर्य की आराधना करें।

ग्रहण के दौरान बने भोजन को त्याग देना उचित माना जाता है। ताजा भोजन बनाकर ही ग्रहण के बाद सेवन करना चाहिए। इसके अलावा मंत्र जाप, विशेष रूप से गायत्री मंत्र या ‘ॐ सूर्याय नमः’ का जप करना शुभ माना गया है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार ग्रहण के बाद दान-पुण्य का भी विशेष महत्व होता है। जरूरतमंदों को अन्न, वस्त्र या धन का दान करने से सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और पुण्य की प्राप्ति होती है।

इन उपायों को श्रद्धा और विश्वास के साथ करने से मन में शांति और जीवन में सकारात्मकता बनी रहती है।


 हिंदू धर्म में अमावस्या तिथि का विशेष महत्व माना गया है, खासकर जब बात फाल्गुन अमावस्या की हो। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यह दिन पितरों को समर्पित होता है। इस दिन विधि-विधान से पूजा, तर्पण और पितृ निवारण स्तोत्र का पाठ करने से पूर्वजों की कृपा प्राप्त होती है और कुंडली में मौजूद पितृ दोष के दुष्प्रभाव कम होते हैं।

पंचांग के अनुसार वर्ष 2026 में फाल्गुन अमावस्या 17 मार्च को पड़ रही है। हालांकि तिथि का सटीक समय स्थान के अनुसार अलग-अलग हो सकता है। अमावस्या के दिन प्रातः स्नान कर पितरों का स्मरण करना और तिल, कुश तथा जल से तर्पण करना अत्यंत शुभ माना गया है।

ज्योतिष मान्यता है कि जिन लोगों की कुंडली में पितृ दोष होता है, उनके जीवन में बार-बार बाधाएं, मानसिक अशांति और कार्यों में रुकावटें आती हैं। ऐसे में इस दिन पितृ निवारण स्तोत्र का श्रद्धापूर्वक पाठ करने से नकारात्मक प्रभाव कम होते हैं और परिवार में सुख-शांति का वातावरण बनता है।

इसके अलावा जरूरतमंदों को अन्न-वस्त्र दान करना, पीपल के वृक्ष पर जल चढ़ाना और पशु-पक्षियों को भोजन कराना भी पुण्यदायी माना गया है। मान्यता है कि सच्ची श्रद्धा से किए गए इन उपायों से पितरों का आशीर्वाद मिलता है और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।