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 अयोध्या से आई ज्योतिषीय जानकारी के अनुसार इस समय कुंभ राशि में बुध और राहु की युति से जड़त्व योग बना हुआ है, जिसका प्रभाव 3 फरवरी से शुरू होकर 11 अप्रैल 2026 तक रहने की संभावना बताई जा रही है। ज्योतिषाचार्य आचार्य सीताराम दास के मुताबिक इस अवधि में खासकर वृषभ, कन्या और वृश्चिक राशि के जातकों को मानसिक तनाव, जिम्मेदारियों के दबाव और निर्णय लेने में उलझन का सामना करना पड़ सकता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि इस योग के दौरान करियर से जुड़े फैसलों में जल्दबाजी से बचना चाहिए और निवेश के मामलों में अतिरिक्त सतर्कता बरतनी जरूरी है। साथ ही व्यक्तिगत संबंधों में संवाद की कमी या गलतफहमी की स्थिति बन सकती है, इसलिए धैर्य और समझदारी से काम लेने की सलाह दी जा रही है। वृश्चिक राशि के जातकों को कार्यक्षेत्र में बढ़ती जिम्मेदारियों के कारण मानसिक दबाव महसूस हो सकता है, जबकि वृषभ और कन्या राशि वालों को आर्थिक योजनाओं और पारिवारिक मामलों में सावधानी बरतने की जरूरत बताई गई है।

हालांकि ज्योतिष विशेषज्ञ यह भी स्पष्ट करते हैं कि ऐसे योग पारंपरिक मान्यताओं पर आधारित होते हैं और इनका असर व्यक्ति की कुंडली, परिस्थिति और प्रयासों पर भी निर्भर करता है। सकारात्मक सोच, ध्यान और संतुलित निर्णय से इस अवधि को बेहतर तरीके से संभाला जा सकता है।


 महाशिवरात्रि के पावन अवसर पर वाराणसी की धार्मिक छटा देखते ही बनती है। मान्यता है कि इसी दिन भगवान शिव और माता पार्वती का दिव्य विवाह हुआ था, इसलिए पूरी काशी शिवमय हो उठती है। देश-विदेश से हजारों श्रद्धालु गंगा घाटों पर पहुंचकर पूजा-अर्चना, गंगा स्नान और शिवभक्ति में लीन हो जाते हैं।

शिवरात्रि के दिन वाराणसी के कुछ खास घाटों की यात्रा को अत्यंत शुभ माना जाता है। दशाश्वमेध घाट अपनी भव्य गंगा आरती और आध्यात्मिक माहौल के लिए प्रसिद्ध है, जबकि मणिकर्णिका घाट मोक्ष से जुड़ी मान्यताओं के कारण विशेष महत्व रखता है। अस्सी घाट पर भक्ति संगीत और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का अलग ही आकर्षण देखने को मिलता है। इसके अलावा पंचगंगा घाट, केदार घाट, राजघाट और तुलसी घाट भी भक्तों के लिए खास माने जाते हैं।

इन घाटों पर दीपों की रोशनी, गंगा आरती और “हर हर महादेव” के जयकारों के बीच श्रद्धालु अद्भुत आध्यात्मिक अनुभव महसूस करते हैं। महाशिवरात्रि पर काशी की यात्रा भक्तों को भक्ति, संस्कृति और आध्यात्मिक ऊर्जा से भर देती है, जिससे यह पर्व और भी यादगार बन जाता है।


 हिंदू परंपरा में महामृत्युंजय मंत्र को अत्यंत शक्तिशाली और आध्यात्मिक रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है। “ॐ त्र्यम्बकं यजामहे…” से शुरू होने वाला यह मंत्र विशेष रूप से संकट, बीमारी और मानसिक तनाव के समय जपा जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार यह मंत्र भगवान शिव को समर्पित है और इसे अकाल मृत्यु से रक्षा तथा जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का स्रोत माना जाता है।

वैदिक ग्रंथों में वर्णित इस मंत्र का संबंध प्राचीन कथा से भी जुड़ा है। मान्यता है कि ऋषि मार्कंडेय ने इसी मंत्र की साधना से मृत्यु पर विजय प्राप्त की थी, जिसके कारण इसे “मृत्युंजय” यानी मृत्यु को जीतने वाला मंत्र कहा जाता है। सदियों से भक्त कठिन परिस्थितियों में इस मंत्र का जाप करते आए हैं और इसे मानसिक साहस तथा आंतरिक शांति का माध्यम मानते हैं।

आध्यात्मिक विशेषज्ञों का मानना है कि नियमित जाप से मन को स्थिरता और सकारात्मक सोच मिलती है। वहीं आधुनिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो मंत्रोच्चार और ध्यान जैसी प्रक्रियाएं मानसिक तनाव को कम करने और मन को शांत रखने में मदद कर सकती हैं। हालांकि यह समझना जरूरी है कि मंत्र की शक्ति आस्था और व्यक्तिगत विश्वास से जुड़ी होती है, इसलिए इसे चमत्कारिक इलाज या निश्चित परिणाम के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।


 हस्तरेखा शास्त्र में हथेली के अलग-अलग हिस्सों को व्यक्ति के स्वभाव और भविष्य से जोड़ा जाता है। इन्हीं में से तर्जनी उंगली के नीचे मौजूद क्षेत्र को गुरु पर्वत कहा जाता है, जिसे नेतृत्व क्षमता, सम्मान और करियर ग्रोथ का संकेत माना जाता है। ज्योतिष विशेषज्ञों के अनुसार, इस पर्वत की बनावट व्यक्ति के आत्मविश्वास, फैसले लेने की क्षमता और जीवन में मिलने वाले अवसरों के बारे में संकेत दे सकती है।

अगर गुरु पर्वत संतुलित और उभरा हुआ दिखाई देता है, तो ऐसे लोग आमतौर पर नेतृत्व की भूमिका में आगे बढ़ते हैं और जिम्मेदारी उठाने से नहीं डरते। पढ़ाई या नौकरी में वे अक्सर टीम लीडर या महत्वपूर्ण पदों पर नजर आते हैं। वहीं यदि यह हिस्सा बहुत अधिक उभरा हो, तो इसे कभी-कभी अहंकार या जल्दबाजी के संकेत से भी जोड़ा जाता है। दूसरी ओर, यदि गुरु पर्वत दबा या सपाट दिखे, तो व्यक्ति में आत्मविश्वास की कमी या निर्णय लेने में झिझक देखी जा सकती है।

हस्तरेखा विशेषज्ञों का कहना है कि गुरु पर्वत के साथ-साथ हथेली की अन्य रेखाएं और संकेत भी महत्वपूर्ण होते हैं, इसलिए किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले पूरी हथेली का अध्ययन जरूरी माना जाता है। ध्यान रहे कि ये मान्यताएं पारंपरिक ज्योतिषीय दृष्टिकोण पर आधारित हैं और इन्हें निश्चित भविष्यवाणी के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।