नवीनतम


 हनुमान चालीसा केवल एक धार्मिक रचना नहीं, बल्कि करोड़ों श्रद्धालुओं के लिए आत्मबल और सुरक्षा का कवच मानी जाती है। 16वीं शताब्दी में गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित यह स्तुति 40 चौपाइयों का संकलन है, जिसमें भक्त और भगवान के बीच अटूट विश्वास झलकता है।

मान्यता है कि तुलसीदास ने कठिन परिस्थितियों में इसका पाठ कर दिव्य कृपा प्राप्त की। तभी से इसे संकटों से मुक्ति दिलाने वाला स्तोत्र माना जाता है। भक्तों का विश्वास है कि नियमित पाठ से भय, नकारात्मकता और मानसिक तनाव दूर होते हैं तथा साहस, ऊर्जा और आत्मविश्वास में वृद्धि होती है।

हनुमान चालीसा में हनुमान की शक्ति, बुद्धि, निष्ठा और भक्ति का वर्णन है। इसमें उनके पराक्रम, रामभक्ति और संकटमोचन स्वरूप का गुणगान किया गया है। यही कारण है कि इसे “दुनिया का सबसे शक्तिशाली मंत्र” कहा जाता है।

आज भी मंगलवार और शनिवार को मंदिरों में विशेष पाठ होता है। कई लोग इसे दैनिक जीवन का हिस्सा मानते हैं और कठिन समय में विशेष रूप से इसका जप करते हैं।

आस्था और विश्वास के संगम से बनी यह रचना भक्ति साहित्य की अमर धरोहर है, जो युगों से लोगों को आध्यात्मिक शक्ति प्रदान कर रही है।


 

हिंदू धर्मग्रंथों के अनुसार मां पार्वती पर्वतराज हिमवान और रानी मेना की पुत्री थीं। इसी कारण उन्हें “हिमालय की बेटी” और “गिरिजा” कहा जाता 

मां पार्वती का जन्म पवित्र हिमालय क्षेत्र में माना जाता है। पुराणों के अनुसार उनका बाल्यकाल हिमालय की शांत और आध्यात्मिक वादियों में बीता। यहीं से उनके जीवन में तप, साधना और भक्ति का बीज पड़ा।

कथाओं में वर्णित है कि पूर्व जन्म में वे सती थीं। पिता दक्ष के यज्ञ में अपमानित होने के बाद उन्होंने योगाग्नि में देह त्याग दी थी। अगले जन्म में पार्वती के रूप में अवतरित होकर उन्होंने पुनः भगवान शिव को पति रूप में पाने का संकल्प लिया।

 उद्देश्य से उन्होंने हिमालय की दुर्गम गुफाओं और वनों में वर्षों तक कठोर तपस्या की। अंततः उनकी साधना सफल हुई और शिव ने उन्हें स्वीकार किया। इस तरह हिमालय न केवल उनका जन्मस्थान, बल्कि उनकी तपस्थली भी रहा।


विवाह के बाद मां पार्वती भगवान शिव के साथ कैलाश पर्वत पर निवास करने लगीं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार कैलाश ही शिव-पार्वती का दिव्य धाम है, जहां से वे समस्त सृष्टि का संचालन करते हैं।

कैलाश पर्वत को केवल भौतिक स्थान नहीं, बल्कि आध्यात्मिक चेतना का केंद्र माना जाता है। हिंदू धर्म के साथ-साथ बौद्ध और जैन परंपराओं में भी इसका विशेष महत्व है। मान्यता है कि यहां शिव परिवार—गणेश और कार्तिकेय सहित—निवास करता है।


इस प्रकार मां पार्वती का मायका हिमालय और ससुराल कैलाश पर्वत माना जाता है। दोनों ही स्थान आज भी श्रद्धालुओं के लिए गहरी आस्था और आध्यात्मिक ऊर्जा के प्रतीक बने हुए हैं।


 उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिले के पवित्र धाम विंध्याचल में स्थित दक्षिणमुखी हनुमान मंदिर आस्था का प्रमुख केंद्र माना जाता है। यह प्राचीन मंदिर मां विंध्यावासिनी देवी के धाम परिसर में स्थित है और हजारों वर्षों से यहां पूजा-अर्चना की परंपरा चली आ रही है।

स्थानीय मान्यताओं के अनुसार इस मंदिर का जिक्र ‘रावण संहिता’ में मिलता है। कहा जाता है कि लंकापति रावण हर स्थान पर दर्शन के लिए नहीं जाते थे, लेकिन मां विंध्यावासिनी और भोलेनाथ के अवतार के दर्शन के लिए वे यहां पुष्पक विमान से आते थे।

इस मंदिर में विराजमान हनुमान दक्षिणमुखी स्वरूप में हैं, जिसे अत्यंत प्रभावशाली और शीघ्र फलदायी माना जाता है। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि यहां सच्चे मन से मांगी गई हर मनोकामना पूर्ण होती है, इसलिए इसे ‘मनोरथ पूर्ण करने वाला मंदिर’ भी कहा जाता है।

हर मंगलवार को हजारों की संख्या में भक्त घी के दीपक, लड्डू और मालाएं लेकर दर्शन करने पहुंचते हैं। हनुमान जयंती के अवसर पर यहां विशेष श्रृंगार किया जाता है और भक्तों की संख्या लाखों तक पहुंच जाती है।

स्थानीय लोगों का कहना है कि संकटमोचन हनुमान यहां अपने भक्तों के कष्ट हरते हैं और सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं। यही वजह है कि यह मंदिर न केवल मिर्जापुर, बल्कि पूरे प्रदेश में गहरी आस्था का केंद्र बना हुआ है।

 

ब्रजभूमि की पावन नगरी वृंदावन में स्थित गोपेश्वर महादेव मंदिर आस्था और भक्ति का अद्भुत संगम है। यह संभवतः देश का एकमात्र शिव मंदिर है, जहां भगवान शिव का श्रृंगार बिंदी, सिंदूर, चूड़ी और स्त्रियों के आभूषणों से किया जाता है। यहां महादेव गोपी स्वरूप में विराजमान हैं।

व ने गोपी अवतार?धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जब भगवान श्रीकृष्ण वृंदावन में महारास रचा रहे थे, तब उस दिव्य रासलीला को देखने की इच्छा भगवान शिव को भी हुई। लेकिन रास में केवल गोपियों को ही प्रवेश की अनुमति थी।

तब शिवजी ने यमुना में स्नान कर गोपी का रूप धारण किया और रास में शामिल हुए। उनकी भक्ति और समर्पण से प्रसन्न होकर श्रीकृष्ण ने उन्हें ‘गोपेश्वर’ नाम दिया, जिसका अर्थ है—गोपियों के ईश्वर।

आज भी इस मंदिर में प्रतिदिन महादेव का श्रृंगार स्त्रियों की भांति किया जाता है। विशेष अवसरों पर उन्हें बिंदी, सिंदूर, चूड़ी, चुनरी और अन्य आभूषणों से सजाया जाता है। सावन और कार्तिक मास में यहां श्रद्धालुओं की विशेष भीड़ उमड़ती है।

गोपेश्वर महादेव मंदिर ब्रज की भक्ति परंपरा का महत्वपूर्ण केंद्र है। मान्यता है कि वृंदावन की यात्रा तब तक पूर्ण नहीं मानी जाती, जब तक भक्त गोपेश्वर महादेव के दर्शन न कर लें।

यह मंदिर इस सत्य का प्रतीक है कि भक्ति में अहंकार का कोई स्थान नहीं—यहां स्वयं देवों के देव महादेव ने प्रेम और भक्ति के लिए गोपी रूप धारण किया।