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 महायान नव वर्ष बौद्ध धर्म की महायान परंपरा से जुड़ा एक आध्यात्मिक पर्व है, जिसे केवल कैलेंडर बदलने का दिन नहीं बल्कि आत्मचिंतन, करुणा और जीवन में नए संकल्प लेने का अवसर माना जाता है। यह उत्सव मुख्य रूप से उन देशों और समुदायों में मनाया जाता है जहां महायान बौद्ध परंपरा का प्रभाव है, जैसे चीन, जापान, कोरिया, वियतनाम और ताइवान। यहां नव वर्ष की शुरुआत अक्सर चंद्र कैलेंडर के आधार पर होती है और धार्मिक अनुष्ठानों के साथ सामाजिक उत्सव भी मनाए जाते हैं।

महायान नव वर्ष के दौरान लोग बुद्ध मंदिरों में जाकर प्रार्थना करते हैं, ध्यान लगाते हैं और दान-पुण्य करते हैं। कई स्थानों पर पुराने वर्ष की नकारात्मकता को छोड़कर नई शुरुआत का संकल्प लिया जाता है। करुणा, शांति और सामूहिक कल्याण की भावना इस पर्व का मूल संदेश है।

भारत में महायान नव वर्ष व्यापक स्तर पर नहीं मनाया जाता, लेकिन लद्दाख, हिमाचल प्रदेश, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश और बौद्ध समुदायों वाले कुछ शहरी क्षेत्रों में इसे सीमित रूप से मनाया जाता है। यहां बौद्ध भिक्षु विशेष पूजा-अर्चना करते हैं और लोग सांस्कृतिक कार्यक्रमों के माध्यम से इस दिन को यादगार बनाते हैं।

इस तरह महायान नव वर्ष केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि आत्मिक शुद्धि, सकारात्मक सोच और समाज में करुणा फैलाने का संदेश देने वाला महत्वपूर्ण आध्यात्मिक अवसर है।


 सनातन धर्म में एकादशी व्रत का विशेष महत्व माना जाता है और हर महीने दो एकादशी आती हैं—कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष में। फरवरी 2026 में पड़ने वाली आमलकी एकादशी फाल्गुन शुक्ल पक्ष की एकादशी है, जिसे रंगभरी एकादशी भी कहा जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन व्रत रखने और भगवान विष्णु की पूजा करने से पापों का नाश होता है और मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।

काशी के ज्योतिषाचार्य पंडित संजय उपाध्याय के अनुसार, वर्ष 2026 में आमलकी एकादशी का व्रत 26 फरवरी को रखा जाएगा। मान्यता है कि इस दिन आंवले के वृक्ष में भगवान विष्णु का निवास होता है, इसलिए आंवले के पेड़ की पूजा करना और विष्णु भगवान को आंवले का फल अर्पित करना अत्यंत शुभ माना गया है।

पूजा के लिए ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें और भगवान विष्णु का ध्यान करते हुए व्रत का संकल्प लें। वैदिक पंचांग के अनुसार इस दिन सुबह 6:15 बजे से 9:40 बजे तक पूजा का शुभ समय माना गया है। इस दौरान विष्णु सहस्त्रनाम, “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जाप और जरूरतमंदों को दान करना भी फलदायी बताया गया है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार श्रद्धा और नियमपूर्वक किया गया आमलकी एकादशी व्रत जीवन में सुख-शांति और आध्यात्मिक उन्नति प्रदान करता है।


महाशिवरात्रि 2026 इस बार विशेष ज्योतिषीय संयोगों के कारण बेहद खास मानी जा रही है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस वर्ष शिव-पार्वती मिलन का दुर्लभ योग बन रहा है, जो वर्षों बाद देखने को मिलेगा। ज्योतिषीय गणनाओं के मुताबिक चंद्रमा और गुरु का प्रभाव भावनात्मक संतुलन, सौभाग्य वृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करने वाला माना जा रहा है। इसी वजह से इस दिन किए गए धार्मिक उपायों को विशेष फलदायी बताया जा रहा है।

मान्यता है कि महाशिवरात्रि की रात शिव तत्व सबसे अधिक सक्रिय रहता है। भक्त उपवास रखते हैं, रात्रि जागरण करते हैं और शिवलिंग पर जल, दूध और बेलपत्र अर्पित कर पूजा करते हैं। कहा जाता है कि इस दिन किए गए सरल उपाय वैवाहिक जीवन की समस्याएं दूर करने, आर्थिक स्थिति सुधारने, मानसिक तनाव कम करने और स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों से राहत दिलाने में सहायक हो सकते हैं।

धार्मिक परंपराओं के अनुसार पहला उपाय है शिवलिंग पर बेलपत्र और कच्चा दूध अर्पित करना, जिससे दांपत्य जीवन में मधुरता आती है। दूसरा उपाय “ॐ नमः शिवाय” मंत्र का जाप है, जो मानसिक शांति और आत्मबल बढ़ाता है। तीसरा उपाय जरूरतमंदों को भोजन या वस्त्र दान करना है, जिसे धन-सौभाग्य से जोड़ा जाता है। चौथा उपाय रात में दीपक जलाकर शिव-पार्वती का ध्यान करना है, जिससे घर में सकारात्मक ऊर्जा बढ़ती है।

हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि आस्था के साथ सकारात्मक सोच और अच्छे कर्म भी जीवन में सफलता और संतुलन के लिए बेहद जरूरी होते हैं। 


 भारतीय समाज में लंबे समय से यह मान्यता प्रचलित है कि सांप गर्भवती महिला को नहीं काटता। गांवों और पारंपरिक परिवारों में अक्सर यह बात सुनने को मिलती है कि मातृत्व की शक्ति के कारण प्रकृति स्वयं गर्भवती स्त्री की रक्षा करती है। धार्मिक दृष्टि से भी इस विश्वास की जड़ें गहरी हैं। हिंदू परंपराओं में नागों को देवता का दर्जा दिया गया है और गर्भवती महिला को सृजन शक्ति का प्रतीक माना जाता है। कई लोककथाओं और पुराणों में गर्भवती स्त्री को देवी स्वरूप बताया गया है, जिससे यह धारणा बनी कि नाग देवता उन्हें नुकसान नहीं पहुंचाते।

हालांकि वैज्ञानिक दृष्टिकोण इस मान्यता की पुष्टि नहीं करता। विशेषज्ञों के अनुसार सांप किसी व्यक्ति की गर्भावस्था को पहचान नहीं सकता और वह खतरा महसूस होने पर किसी को भी काट सकता है। सांप का व्यवहार मुख्य रूप से आत्मरक्षा और वातावरण पर निर्भर करता है, न कि व्यक्ति की शारीरिक अवस्था पर। इसलिए इस तरह की मान्यताओं पर पूरी तरह भरोसा करना खतरनाक हो सकता है।

डॉक्टर और वन्यजीव विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि गर्भवती महिलाएं ही नहीं, बल्कि हर व्यक्ति को सांपों से दूरी बनाए रखनी चाहिए और सावधानी बरतनी चाहिए। ग्रामीण क्षेत्रों में साफ-सफाई, रोशनी और सतर्कता बेहद जरूरी है। निष्कर्ष यही है कि आस्था और परंपराएं अपनी जगह महत्वपूर्ण हैं, लेकिन सुरक्षा के लिए वैज्ञानिक समझ और व्यवहारिक सावधानी ही सबसे सुरक्षित रास्ता माना जाता है।