प्राचीन भारतीय समाज में “नियोग” एक धर्मसम्मत प्रथा मानी जाती थी, जिसके तहत संतान प्राप्ति के लिए विशेष परिस्थितियों में किसी अन्य योग्य पुरुष से संतान उत्पन्न की अनुमति दी जाती थी। Mahabharata में वर्णित कथाओं के अनुसार, धृतराष्ट्र, पांडु और विदुर का जन्म इसी व्यवस्था के तहत हुआ था। आगे चलकर पांडवों के जन्म से जुड़ी कथाएं भी नियोग की परंपरा से संबंधित मानी जाती हैं।

लेकिन महाभारत काल के बाद यह प्रथा धीरे-धीरे समाप्त हो गई। परंपरागत मान्यताओं के अनुसार, Manu ने सामाजिक मर्यादा, वंश व्यवस्था और पारिवारिक संरचना को अधिक व्यवस्थित करने के उद्देश्य से नियोग प्रथा को हतोत्साहित किया। मनुस्मृति में विवाह, वंश और स्त्री-पुरुष संबंधों को लेकर सख्त नियम निर्धारित किए गए, जिनमें वैवाहिक निष्ठा और कुल परंपरा की शुद्धता पर विशेष जोर दिया गया।

विशेषज्ञों का मानना है कि समय के साथ समाज अधिक स्थिर और संरचित होता गया। राजसत्ता, संपत्ति के अधिकार और वंश परंपरा की स्पष्टता बनाए रखने के लिए एक पति-पत्नी आधारित पारिवारिक व्यवस्था को प्राथमिकता दी गई। नियोग जैसी व्यवस्था, जो विशेष परिस्थितियों में स्वीकार्य थी, बाद के सामाजिक मानकों के अनुरूप नहीं मानी गई।

हालांकि, इतिहासकार यह भी कहते हैं कि नियोग को उस समय की सामाजिक जरूरतों के संदर्भ में समझना चाहिए। बदलते सामाजिक, धार्मिक और कानूनी ढांचे के कारण यह प्रथा धीरे-धीरे समाप्त होती चली गई।

 

ब्रज की पावन धरती पर होली का उत्सव चरम पर है। Nandgaon में प्रसिद्ध लट्ठमार होली की शुरुआत हो चुकी है। कृष्ण-बलदाऊ के आंगन से लेकर लट्ठमार चौक तक रंग, गुलाल, ढोल-नगाड़ों और रसिया की गूंज सुनाई दे रही है। देश-विदेश से हजारों श्रद्धालु इस अनोखी परंपरा को देखने पहुंचे हैं।

ब्रज की होली का सीधा संबंध Krishna और राधा की लीलाओं से जोड़ा जाता है। मान्यता है कि जैसे Barsana राधा रानी की नगरी है, वैसे ही नंदगांव कृष्ण की बाल-लीलाओं की भूमि है। परंपरा के अनुसार, बरसाना में लट्ठमार होली के बाद वहां के हुरियारे नंदगांव पहुंचते हैं, जहां हुरियारिनें लट्ठ लेकर उनका प्रतीकात्मक स्वागत करती हैं। यह आयोजन प्रेम, हास-परिहास और सांस्कृतिक विरासत का अनूठा संगम है।

टेसू के फूलों से बने प्राकृतिक रंग, पारंपरिक वेशभूषा और लोकगीतों की मधुर धुन इस उत्सव को और खास बनाती है। मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना के बाद जुलूस निकलते हैं और पूरा वातावरण भक्तिमय हो उठता है।

नंदगांव की लट्ठमार होली केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि ब्रज संस्कृति की जीवंत झलक है। हर वर्ष यह आयोजन सामाजिक सौहार्द और परंपरा की मिसाल बनकर सामने आता है, जहां रंगों के साथ आस्था और आनंद का भी उत्सव मनाया जाता है।


 

भारतीय परंपराओं में तिलक केवल एक धार्मिक चिह्न नहीं, बल्कि आध्यात्मिक ऊर्जा और संरक्षण का प्रतीक माना गया है। शास्त्रों के अनुसार तिलक माथे के उस स्थान पर लगाया जाता है जिसे आज्ञा चक्र कहा जाता है—दोनों भौंहों के बीच का भाग। योग और तंत्र शास्त्र में इसे चेतना और जागरूकता का केंद्र माना गया है।

मान्ता है कि तिलक लगाने से मन स्थिर होता है, ध्यान शक्ति बढ़ती है और विचारों में स्पष्टता आती है।

तिलक को एक प्रकार का ‘ऊर्जा कवच’ माना गया है, जो नकारात्मक प्रभावों से रक्षा करता है।

  • चंदन तिलक: शांति और शीतलता का प्रतीक।

  • रोली या कुमकुम: शक्ति और मंगल का संकेत।

  • हल्दी तिलक: पवित्रता और सौभाग्य से जुड़ा।

  • भस्म (विभूति): वैराग्य और आध्यात्मिकता का प्रतीक, जिसका उल्लेख शिव पुराण में भी मिलता है।

  • अक्षत (चावल) के साथ तिलक: पूर्णता और समृद्धि का भाव।

  • स्नान के बाद स्वच्छ अवस्था में तिलक लगाएं।

  • दाहिने हाथ की अनामिका या अंगूठे से तिलक करना शुभ माना जाता है।

  • तिलक लगाते समय इष्ट देव का स्मरण करें।

विशेषज्ञों का कहना है कि तिलक आस्था का विषय है। इसे श्रद्धा, स्वच्छता और सकारात्मक भाव के साथ करना ही सबसे महत्वपूर्ण माना गया है।


 

उज्जैन। 3 मार्च 2026 को साल का पहला चंद्रग्रहण लगने जा रहा है। धार्मिक पंचांग के अनुसार यह ग्रहण दोपहर 3:19 बजे से शाम 6:47 बजे तक रहेगा। चूंकि यह भारत में दिखाई देगा, इसलिए सूतक काल भी मान्य रहेगा।

उज्जैन के ज्योतिषाचार्य पंडित आनंद भारद्वाज के अनुसार, ग्रहण काल को सामान्य समय की तुलना में संवेदनशील माना जाता है। पारंपरिक मान्यताओं में कहा जाता है कि इस दौरान वातावरण में नकारात्मक ऊर्जा बढ़ सकती है, इसलिए विशेष रूप से गर्भवती महिलाओं को सावधानी बरतने की सलाह दी जाती है।

  • ग्रहण के दौरान सीधे चंद्रमा की रोशनी में न जाएं।

  • अनावश्यक रूप से घर से बाहर निकलने से बचें।

  • ग्रहण काल में भोजन न पकाएं और न ही ग्रहण के दौरान भोजन करें।

  • ग्रहण समाप्ति के बाद स्नान कर ही भोजन ग्रहण करें।

  • शांत मन से ईश्वर स्मरण और भजन-कीर्तन करें।

धार्मिक परंपरा के अनुसार सूतक काल ग्रहण समाप्ति से लगभग 12 घंटे पहले शुरू हो जाता है। इस दौरान शुभ कार्य वर्जित माने जाते हैं और कई मंदिरों के पट बंद रखे जाते हैं।

हालांकि, चिकित्सा विज्ञान के अनुसार चंद्रग्रहण का गर्भस्थ शिशु पर सीधा प्रभाव होने के प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि गर्भवती महिलाओं को सबसे ज्यादा जरूरत संतुलित आहार, पर्याप्त आराम और नियमित चिकित्सकीय देखभाल की होती है।

आस्था और विज्ञान के बीच संतुलन रखते हुए सावधानी बरतना ही सबसे बेहतर उपाय माना जाता है।


 Holi 2026 Upay: होली का पर्व नजदीक आते ही कई धार्मिक मान्यताएं भी चर्चा में आ जाती हैं। कुछ परंपराओं में माना जाता है कि होलाष्टक से लेकर होली तक का समय संवेदनशील होता है और इस दौरान नकारात्मक ऊर्जा, बुरी नजर या तंत्र-मंत्र का प्रभाव बढ़ सकता है। हालांकि इन बातों के वैज्ञानिक प्रमाण सीमित हैं, लेकिन आस्था के आधार पर लोग एहतियात बरतते हैं।

विशेष रूप से जिन घरों में छोटे बच्चे और गर्भवती महिलाएं होती हैं, वहां अतिरिक्त सावधानी रखने की सलाह दी जाती है, क्योंकि इस अवस्था में शारीरिक और मानसिक संवेदनशीलता अधिक होती है।

  • घर में नियमित रूप से साफ-सफाई और धूप-दीप जलाना।

  • संध्या समय हनुमान चालीसा या दुर्गा सप्तशती का पाठ।

  • मुख्य द्वार पर गंगाजल का छिड़काव।

  • बच्चों और गर्भवती महिलाओं को भीड़भाड़ और अत्यधिक शोर से दूर रखना।

  • सकारात्मक वातावरण बनाए रखने के लिए भजन-कीर्तन या मंत्रोच्चार।

धार्मिक मान्यता है कि होली का पर्व बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है, जिसका संबंध होलिका और प्रह्लाद की कथा से जुड़ा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि सबसे महत्वपूर्ण है स्वच्छता, संतुलित आहार और सकारात्मक सोच। किसी भी तरह की शारीरिक या मानसिक परेशानी होने पर डॉक्टर की सलाह लेना ही सर्वोत्तम उपाय है।


 मृत्यु जीवन का अटल सत्य है, लेकिन इसके संकेतों को लेकर समाज में लंबे समय से चर्चा होती रही है। गरुड़ पुराण में मृत्यु से पहले मिलने वाले कुछ शारीरिक और मानसिक संकेतों का विस्तार से वर्णन मिलता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, ये संकेत आत्मा की यात्रा की तैयारी का हिस्सा माने जाते हैं, जबकि आधुनिक विज्ञान इन्हें शारीरिक और मानसिक परिवर्तनों से जोड़कर देखता है।

  • व्यक्ति का अचानक अधिक शांत या अंतर्मुखी हो जाना

  • सांसों की गति और शरीर की ऊर्जा में बदलाव

  • भोजन में अरुचि या स्वाद में परिवर्तन

  • अपनों से दूरी बनाना या आध्यात्मिक विषयों में रुचि बढ़ना

  • कुछ लोगों का अपने जीवन से जुड़ी अधूरी बातों को पूरा करने की कोशिश करना

धार्मिक दृष्टिकोण में माना जाता है कि ये संकेत आत्मा के अगले पड़ाव की तैयारी का संकेत हो सकते हैं। वहीं, चिकित्सा विशेषज्ञों का कहना है कि गंभीर बीमारियों, बढ़ती उम्र या मानसिक स्थिति में बदलाव के कारण भी ऐसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि इन विषयों को अंधविश्वास की बजाय संवेदनशीलता और समझ के साथ देखना चाहिए। यदि किसी व्यक्ति में अचानक शारीरिक या मानसिक बदलाव नजर आएं, तो चिकित्सकीय सलाह लेना जरूरी है।

यह विषय आस्था और विज्ञान के बीच संतुलन का है, जहां एक ओर धार्मिक मान्यताएं हैं, तो दूसरी ओर आधुनिक चिकित्सा की व्याख्या।


 हरिद्वार। हिंदू पंचांग के अनुसार होलिका दहन से पहले शुरू होने वाले आठ दिनों को होलाष्टक कहा जाता है। मान्यता है कि ये दिन तंत्र-मंत्र साधना और मंत्र सिद्धि के लिए विशेष फलदायी होते हैं। वर्ष 2026 में होलाष्टक की शुरुआत 24 फरवरी से होकर 3 मार्च (होलिका दहन) तक रहेगी।

हरिद्वार के ज्योतिषी पंडित श्रीधर शास्त्री के अनुसार, सामान्य दिनों में किसी मंत्र को सिद्ध करने के लिए सवा लाख (1,25,000) जाप करने का विधान बताया गया है। लेकिन होलाष्टक के दौरान यदि श्रद्धा और विधि-विधान से 11,000 बार जाप किया जाए, तो उसे सवा लाख जाप के समान फलदायी माना जाता है।

धार्मिक मान्यता है कि इन आठ दिनों में साधना करने से नकारात्मक ऊर्जा, टोना-टोटका और बाधाएं प्रभावहीन हो सकती हैं। साथ ही घर में सुख-समृद्धि और सकारात्मकता का वास होता है।

  • ब्रह्ममुहूर्त में स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें।

  • पूजन स्थान पर दीप और धूप प्रज्वलित करें।

  • अपने इष्ट देव का ध्यान कर मंत्र का संकल्प लें।

  • एकाग्र मन से 11,000 जाप पूर्ण करें (माला के माध्यम से गिनती रखें)।

ध्यान रहे कि मंत्र सिद्धि के लिए नियम, संयम और सात्विक आहार का पालन आवश्यक माना गया है।

 

Bajrang Baan Path Niyam: बजरंग बाण का पाठ करना चाहिए या नहीं—यह सवाल अक्सर श्रद्धालुओं के मन में उठता है। कुछ लोग मानते हैं कि इसमें हनुमान जी को प्रभु श्रीराम की शपथ दी जाती है, इसलिए इसे सामान्य रूप से नहीं पढ़ना चाहिए। वहीं कई भक्त इसे संकटमोचन उपाय मानते हैं। धर्म-शास्त्र के जानकारों के अनुसार सच्चाई संतुलित दृष्टिकोण में छिपी है।

बजरंग बाण भगवान हनुमान को समर्पित एक शक्तिशाली स्तुति मानी जाती है। इसमें भक्त संकट निवारण के लिए आह्वान करता है। परंपरा में इसे विशेष परिस्थितियों—जैसे भय, बाधा या मानसिक संकट—में पढ़ने की सलाह दी जाती है।

हनुमान जी की पूजा का प्रमुख दिन मंगलवार और शनिवार माना जाता है। हालांकि शास्त्रों में ऐसा कोई स्पष्ट निषेध नहीं है कि इसे अन्य दिनों में नहीं पढ़ा जा सकता। विशेषज्ञों का कहना है कि:

  • यदि नियमित भक्ति के रूप में पाठ करना हो तो हनुमान चालीसा अधिक सरल और सौम्य मानी जाती है।

  • बजरंग बाण का पाठ विशेष संकल्प या आपात स्थिति में अधिक प्रभावी माना जाता है।

धर्म-शास्त्र के विद्वानों के अनुसार हानि का प्रश्न तब उठता है जब:

  • पाठ क्रोध, अहंकार या किसी के अहित की भावना से किया जाए।

  • शुद्धता, नियम और श्रद्धा का अभाव हो।

बजरंग बाण में प्रभु राम की शपथ का उल्लेख आता है, इसलिए इसे अत्यंत श्रद्धा और संयम के साथ पढ़ने की सलाह दी जाती है। सामान्य भक्ति के लिए हनुमान चालीसा या सुंदरकांड अधिक संतुलित विकल्प माने जाते हैं।