खेल केवल प्रतिस्पर्धा नहीं, बल्कि मर्यादा, संवेदनशीलता और सम्मान का भी नाम है। खेल भावना का वास्तविक अर्थ निष्पक्षता, आपसी आदर और मानवीय मूल्यों को बनाए रखना है, न कि भावनाओं से खेलना या किसी समुदाय, देश या व्यक्ति की संवेदनाओं को आहत करना।
मुस्तफिजुर रहमान प्रकरण के संदर्भ में यह संदेश स्पष्ट रूप से सामने आया है कि भारत मानवाधिकार उल्लंघन और धार्मिक हिंसा जैसे गंभीर मुद्दों पर चुप नहीं रह सकता। खेल के मंच का उपयोग यदि किसी तरह की राजनीतिक, धार्मिक या विभाजनकारी भावना को बढ़ावा देने के लिए किया जाता है, तो यह खेल की आत्मा के विरुद्ध है।
भारत का रुख यह दर्शाता है कि खेल और कूटनीति अलग हो सकते हैं, लेकिन मानवीय मूल्यों से समझौता नहीं किया जा सकता। अंतरराष्ट्रीय खेल आयोजनों में भागीदारी का अर्थ यह नहीं कि मूलभूत अधिकारों और नैतिक जिम्मेदारियों को नजरअंदाज कर दिया जाए।
खिलाड़ियों से अपेक्षा की जाती है कि वे अपने आचरण से खेल की गरिमा बनाए रखें। खेल भावना तभी सार्थक है जब वह मानवता, शांति और सौहार्द के संदेश को मजबूत करे, न कि विवाद और असंवेदनशीलता को जन्म दे।

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