संपूर्ण सृष्टि का प्रपंच अविद्या से संचालित प्रतीत होता है, और इस अविद्या का साक्षी है मन। मन स्वयं सृष्टि का द्रष्टा होते हुए भी उसी माया में उलझ जाता है, जिसे वह देख रहा होता है। अविद्या निरंतर मन को चंचल बनाए रखती है—विचारों, वासनाओं और कल्पनाओं की अंतहीन शृंखला में बाँधकर।
विशेषकर उनका मन अधिक विचलित रहता है, जिनमें सोम तत्व गौण हो जाता है—अर्थात शांति, स्थिरता और करुणा का अभाव हो जाता है। ऐसा मन बाह्य आकर्षणों में फँसकर सत्य से दूर होता चला जाता है।
स्त्री इस माया का मातृत्व भाव है। वह केवल देह नहीं, बल्कि संपूर्ण ब्रह्माण्ड का प्रतीक है। जैसे ब्रह्माण्ड सृष्टि, पोषण और लय का चक्र है, वैसे ही स्त्री सृजन की मूल शक्ति है। उसमें माया भी है और मुक्ति का द्वार भी।
जब मन अविद्या में डूबा होता है, तब स्त्री माया बन जाती है;
और जब चेतना जाग्रत होती है, तब वही स्त्री शक्ति बनकर ब्रह्म का बोध कराती है।
स्त्री और ब्रह्माण्ड का संबंध देह का नहीं, चेतना का है।
जहाँ मातृत्व है, वहाँ सृजन है;
और जहाँ सृजन है, वहीं ब्रह्म की उपस्थिति है।

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