रमजान का पाक महीना शुरू होते ही इबादत और रूहानियत का माहौल बन जाता है। मस्जिदों में नमाजियों की तादाद बढ़ जाती है, घरों में सेहरी और इफ्तार की तैयारियां शुरू हो जाती हैं। इस्लाम में रोजा पांच बुनियादी फर्जों में शामिल है और इसे आत्म-संयम व तक़वा हासिल करने का जरिया माना गया है। पवित्र ग्रंथ कुरआन में रोजे का मकसद इंसान को परहेजगार और जिम्मेदार बनाना बताया गया है।

रोजा केवल सुबह से शाम तक भूखे-प्यासे रहने का नाम नहीं है। यह अपनी इच्छाओं पर काबू पाने, बुरे विचारों से दूर रहने और अच्छे आचरण को अपनाने का अभ्यास है। रोजे के दौरान झूठ, चुगली, गाली-गलौज, गुस्सा और बेईमानी से तौबा करना जरूरी माना गया है। इस्लामिक शिक्षाओं के अनुसार, अगर इंसान अपने व्यवहार में सुधार नहीं लाता तो केवल भूखा रहना रोजे की असली भावना को पूरा नहीं करता।

रमजान का महीना रहमत, बरकत और मगफिरत का समय है। इस दौरान जकात और सदका देकर जरूरतमंदों की मदद करने पर खास जोर दिया जाता है। यह महीना इंसान को अपने भीतर झांकने, गलतियों से तौबा करने और समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने की सीख देता है।

रोजे का असली मकसद खुद को बेहतर इंसान बनाना और अल्लाह की इबादत के जरिए दिल और दिमाग को पाक करना है।

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