भगवान शिव के गले में लिपटे सर्प का नाम वासुकि है। वासुकि को नागों का राजा माना जाता है और हिंदू धर्मग्रंथों में उनका विशेष स्थान है। शिव की प्रतिमाओं और चित्रों में वासुकि को उनके कंठ में लिपटा दिखाया जाता है, जो गहरे आध्यात्मिक और प्रतीकात्मक अर्थ रखता है।

पुराणों के अनुसार वासुकि कश्यप ऋषि और कद्रू के पुत्र थे। उन्हें शेषनाग का भाई भी बताया गया है। समुद्र मंथन की प्रसिद्ध कथा में देवताओं और असुरों ने मंदराचल पर्वत के चारों ओर वासुकि को लपेटकर रस्सी की तरह उपयोग किया था। इस प्रसंग से उनके विशाल और दिव्य आकार का अंदाजा लगाया जाता है।

शिव के गले में वासुकि का विराजमान होना कई अर्थों में महत्वपूर्ण है। यह दर्शाता है कि भगवान शिव भय, मृत्यु और विष पर नियंत्रण रखते हैं। साथ ही सर्प को कुंडलिनी शक्ति, ऊर्जा और जागरण का प्रतीक भी माना जाता है।

धार्मिक मान्यता है कि शिव का सर्प इस बात का संकेत है कि जो व्यक्ति अपने भय और अहंकार पर विजय पा लेता है, वही सच्चे अर्थों में आध्यात्मिक उन्नति कर सकता है। इस तरह वासुकि केवल एक पौराणिक पात्र नहीं, बल्कि शक्ति, संतुलन और आत्मनियंत्रण का प्रतीक हैं।

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