अनंतानंद सरस्वती ने धर्म और जीवन मूल्यों पर विचार व्यक्त करते हुए कहा कि मानव जीवन का वास्तविक उद्देश्य धर्म के मार्ग पर चलना है। उनके अनुसार, धर्म केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सत्य, करुणा, सेवा, संयम और कर्तव्य का मार्ग है।
उन्होंने कहा कि जिस व्यक्ति के जीवन में धर्म जितना अधिक होता है, उसका जीवन उतना ही अधिक संतुलित, शांत और कल्याणकारी बनता है। धर्म व्यक्ति को सही और गलत का बोध कराता है, जिससे समाज में सद्भाव और न्याय की स्थापना होती है।
अनंतानंद सरस्वती ने आगे कहा कि आज के भौतिकवादी युग में लोग धर्म को भूलते जा रहे हैं, जिसके कारण अशांति, तनाव और नैतिक पतन बढ़ रहा है। यदि व्यक्ति अपने दैनिक जीवन में धर्म को अपनाए—चाहे वह परिवार हो, समाज हो या कार्यक्षेत्र—तो जीवन की कई समस्याएं स्वतः ही समाप्त हो सकती हैं।
उन्होंने युवाओं से विशेष अपील करते हुए कहा कि धर्म को रूढ़ि नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला के रूप में अपनाएं। धर्म व्यक्ति को अहंकार से दूर रखता है और सेवा भाव की ओर प्रेरित करता है।
अपने संदेश के अंत में उन्होंने कहा कि
“धर्म से ही व्यक्ति का, समाज का और राष्ट्र का कल्याण संभव है।”

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