संतों का स्पष्ट संदेश है कि केवल ज्ञान अर्जित कर लेना ही जीवन के लिए पर्याप्त नहीं होता। जब तक उस ज्ञान को अपने दैनिक जीवन, व्यवहार और कर्म में नहीं उतारा जाता, तब तक उसका कोई वास्तविक फल नहीं मिलता। शास्त्र पढ़ना, प्रवचन सुनना और उपदेश दोहराना तब तक निरर्थक है, जब तक वही ज्ञान हमारे आचरण में परिवर्तन न लाए।

संतों के अनुसार ज्ञान का उद्देश्य दिखावा नहीं, बल्कि जीवन का रूपांतरण है। जब ज्ञान व्यवहार में उतरता है, तभी वह मनुष्य को अहंकार से मुक्त करता है, विवेक प्रदान करता है और सही–गलत का स्पष्ट बोध कराता है।

सच्चा शिष्य वही माना जाता है जो केवल सुनने तक सीमित न रहे, बल्कि समझकर उस ज्ञान को अपने जीवन में अपनाए। थोड़े से ज्ञान को भी यदि ईमानदारी से व्यवहार में उतार लिया जाए, तो वही साधना बन जाता है और वही मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करता है। संतों की यह सीख हमें याद दिलाती है कि ज्ञान तभी सार्थक है, जब वह जीवन में दिखाई दे।



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