एक आश्रम में दो संत रहते थे।
दोनों ही ईश्वर के बड़े भक्त थे, लेकिन उनकी भक्ति का तरीका अलग था।

एक संत दिन-रात मंदिर में बैठकर पूजा-पाठ, जप और भजन में लीन रहते थे।
दूसरे संत आश्रम के काम करते, बीमारों की सेवा करते, भूखों को भोजन कराते और जरूरतमंदों की मदद करते।

एक दिन पहले संत को लगा कि
“मैं तो पूरा जीवन भगवान की आराधना में लगा रहा हूँ,
और यह सेवा के नाम पर घूमता रहता है…
निश्चय ही मेरी भक्ति श्रेष्ठ है।”

विवाद बढ़ा और दोनों गुरुजी के पास पहुँचे।

गुरुजी मुस्कराए और बोले —
“कल सुबह तुम दोनों जंगल जाना।
जो रास्ते में सबसे पहले भगवान को पा ले, वही श्रेष्ठ भक्त माना जाएगा।”

अगली सुबह दोनों निकल पड़े।
रास्ते में उन्हें एक बूढ़ा व्यक्ति मिला, जो प्यास और कमजोरी से गिरा हुआ था।

सेवक संत तुरंत उसके पास गया, उसे पानी पिलाया, सहारा दिया और आश्रम तक पहुँचा दिया।
जबकि पूजा-पाठ वाले संत बोले —
“मुझे भगवान की खोज करनी है, मुझे देर हो रही है।”
और आगे बढ़ गए।

कुछ दूर जाने के बाद वह संत थक कर बैठ गया…
और तभी उसे आवाज़ आई —
“जिसे तू छोड़कर आया है, उसी में मैं था।”

वह समझ गया कि
भगवान केवल मंदिर में नहीं,
बल्कि हर पीड़ित, हर जरूरतमंद और हर इंसान में बसे हैं।

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