एक गांव में एक संत रहते थे। लोग अपनी परेशानियां लेकर उनके पास आते और मार्गदर्शन पाते। एक दिन एक युवक बहुत क्रोधित अवस्था में संत के पास पहुंचा। उसने कहा, “गुरुदेव, मेरे घर में रोज झगड़ा होता है। रिश्ते टूटने की कगार पर हैं। मैं क्या करूं?”
संत मुस्कुराए और उसे एक दीपक जलाकर लाने को कहा। युवक दीपक लेकर आया। संत ने कहा, “अब इस दीपक को हवा के तेज झोंके के सामने रखो।” दीपक बुझ गया। फिर संत ने उसे दीवार के कोने में रखकर कहा, “अब हवा आने दो।” इस बार दीपक नहीं बुझा।
संत बोले, “जब दो लोग गुस्से की हवा में खड़े होते हैं, तो रिश्ता दीपक की तरह बुझ जाता है। लेकिन अगर उनमें से एक भी दीवार की तरह शांत और स्थिर हो जाए, तो झगड़ा बढ़ नहीं पाता।”
झगड़े की जड़ अक्सर गुस्सा होता है।
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गुस्से में कही गई बातें दिल को गहरे जख्म देती हैं।
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यदि एक व्यक्ति भी संयम रख ले, तो विवाद शांत हो सकता है।
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प्रतिक्रिया देने से पहले कुछ पल रुकें।
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गहरी सांस लें और शब्दों का चयन सोच-समझकर करें।
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रिश्ते जीतने की कोशिश करें, बहस नहीं।
गुस्सा क्षणिक होता है, लेकिन उसके परिणाम लंबे समय तक रिश्तों को प्रभावित करते हैं। अगर हम में से कोई एक भी शांत रहने का संकल्प ले ले, तो कई टूटते रिश्ते बच सकते हैं।


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