माघ महीने में प्रयागराज का संगम क्षेत्र आस्था और साधना का प्रमुख केंद्र बन जाता है, जहां हजारों श्रद्धालु कल्पवास के लिए पहुंचते हैं। कल्पवास के दौरान नियमपूर्वक स्नान, जप, हवन और दान-पुण्य किए जाते हैं। इन्हीं विशेष दानों में से एक है शय्या दान, जिसे धार्मिक परंपराओं में त्याग, सेवा और आत्मिक शांति का प्रतीक माना गया है। कई लोगों के मन में सवाल उठता है कि यह दान मृत्यु के बाद या कल्पवास पूर्ण होने पर ही क्यों किया जाता है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, शय्या दान जीवन की अस्थायीता और मोह त्याग का संदेश देता है। कल्पवास समाप्त होने पर साधक अपनी शय्या दान कर यह संकेत देता है कि उसने सांसारिक सुख-सुविधाओं से विरक्ति का अभ्यास किया है। वहीं मृत्यु के बाद शय्या दान आत्मा की शांति और परलोक में शुभ फल की कामना से किया जाता है। प्रयागराज में परंपरा अनुसार यह दान प्रयागवालों को दिया जाता है, जिन्हें इसका अधिकारी माना जाता है।
भोपाल निवासी ज्योतिषी एवं वास्तु सलाहकार पंडित हितेंद्र कुमार शर्मा के अनुसार, शय्या दान केवल एक धार्मिक कर्मकांड नहीं बल्कि सेवा, त्याग और आध्यात्मिक जागरूकता का प्रतीक है। श्रद्धा और समझ के साथ किया गया यह दान व्यक्ति को मानसिक शांति और पुण्य फल प्रदान करने वाला माना जाता है।
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