नमः शिवाय” केवल एक मंत्र नहीं, बल्कि भारतीय आध्यात्मिक परंपरा का गहरा सार है। इस पंचाक्षरी मंत्र की महिमा का वर्णन पंचाक्षर स्तोत्रम में मिलता है, जिसे परंपरा के अनुसार आदि शंकराचार्य की रचना माना जाता है। इस स्तोत्र में पांच श्लोक हैं और हर श्लोक “न-म-शि-वा-य” के एक अक्षर से जुड़ा है, जो भगवान शिव के अलग-अलग गुणों का वर्णन करता है।
“न” अहंकार के नाश और विनम्रता का प्रतीक है। “म” आत्मसंयम और शुद्धता का संदेश देता है। “शि” कल्याण और मंगल का भाव दर्शाता है। “वा” जीवन ऊर्जा और प्राण तत्व से जुड़ा है, जबकि “य” आत्मा के परमात्मा से मिलन का संकेत माना जाता है।
स्तोत्र के श्लोकों में भगवान शिव के प्रतीकों—जैसे भस्म, गंगा, चंद्र, नाग और त्रिनेत्र—का उल्लेख मिलता है। ये प्रतीक सादगी, वैराग्य, संतुलन और आत्मचेतना का संदेश देते हैं।
आध्यात्मिक दृष्टि से “नमः शिवाय” का जप मन को शांत करने और विचारों को स्थिर करने में सहायक माना जाता है। यह केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि जीवन को संतुलित और जागरूक तरीके से जीने की प्रेरणा भी देता है।


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