एक समय की बात है, एक गाँव में एक संत रहते थे। उनके पास कई शिष्य आते और जीवन की परेशानियों का समाधान ढूँढते। एक दिन, उनके एक शिष्य ने कहा,

"स्वामी जी, लोग हमेशा मेरी निंदा करते हैं, मेरी आलोचना करते हैं। मैं परेशान हो जाता हूँ, मेरा मन शांत नहीं रहता। मैं क्या करूँ?"

संत ने शांति से मुस्कुराते हुए कहा,
"बेटा, ध्यान दो। जब तुम दूसरों की नकारात्मक बातें सुनते हो और उन पर ध्यान देते हो, तो तुम अपनी ऊर्जा और समय उन्हें दे रहे हो। पर तुम्हारा वास्तविक उद्देश्य क्या है? अपने कर्मों और अपने काम को बेहतर बनाना।"

संत ने शिष्य को आगे समझाया,
"अगर तुम अपनी मेहनत, अपनी पढ़ाई, अपने कर्म और अपने लक्ष्य पर ध्यान दोगे, तो नकारात्मक बातें अपने आप अप्रभावी हो जाएँगी। दूसरों की आलोचना केवल उनके मन की परछाई है, इसे अपने मन में जगह मत दो।"

शिष्य ने संत की बात मानी और अपने काम और अभ्यास पर पूरी ऊर्जा लगाने लगा। कुछ ही समय में उसने महसूस किया कि नकारात्मक टिप्पणियाँ उसका मन परेशान नहीं कर पातीं। उसकी मन की शांति बढ़ी और जीवन में सफलता भी आने लगी।

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