एक दिन एक शिष्य अपने संत के पास आया और बोला:
"स्वामी जी, कभी-कभी मैं मुश्किल समय में बहुत दुखी हो जाता हूँ, और खुशियों में बहुत उत्साहित हो जाता हूँ। फिर जीवन का संतुलन बिगड़ जाता है। मैं क्या करूँ?"
संत ने शांति से उत्तर दिया:
"बेटा, जीवन का रहस्य यह है कि न दुख में ज्यादा डूबो और न सुख में अत्यधिक प्रसन्न हो। जैसे समुद्र की लहरें उठती और गिरती रहती हैं, वैसे ही जीवन के दुख और सुख आते रहते हैं। अगर तू हर बार उन्हें अपने मन पर हावी होने देगा, तो मन अशांत रहेगा।"
संत ने आगे समझाया:
"मुश्किल समय में धैर्य और समझ बनाए रख, और अच्छे समय में अहंकार और अत्यधिक उत्साह से बच। जो स्थिर मन रखता है, वही सच्ची शांति और संतोष पा सकता है।"
शिष्य ने संत की बात मानी। उसने अपने मन को स्थिर रखना सीख लिया और धीरे-धीरे महसूस किया कि न तो दुख उसे परेशान करता और न ही सुख उसे अति उत्साहित करता।


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