रात के आसमान में जब पूरा चांद अपनी चांदनी बिखेरता है, तो अक्सर कहा जाता है—“आज पूर्णिमा है, इसलिए मन कुछ अलग-सा है।” लेकिन क्या सच में चंद्रमा हमारे व्यवहार को बदल देता है? या यह केवल लोकविश्वास और मनोविज्ञान का असर है?

ग्रहों के मानव जीवन पर प्रभाव की अवधारणा में आस्था, परंपरा और विज्ञान—तीनों का अपना-अपना पक्ष है। आइए समझते हैं इस रहस्य को।

विज्ञान के अनुसार चंद्रमा का पृथ्वी पर गुरुत्वाकर्षण प्रभाव स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। समुद्र में उठने वाला ज्वार-भाटा (Tides) इसी का परिणाम है। जब पूर्णिमा या अमावस्या होती है, तब चंद्रमा और सूर्य एक सीध में होते हैं, जिससे समुद्र में ऊंचे ज्वार आते हैं।

यही तथ्य कई लोगों को यह सोचने पर मजबूर करता है कि जब चंद्रमा महासागरों को प्रभावित कर सकता है, तो क्या वह मानव शरीर—जो लगभग 60-70% पानी से बना है—पर भी असर डाल सकता है?

हालांकि वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि मानव शरीर पर चंद्रमा का गुरुत्वाकर्षण प्रभाव अत्यंत सूक्ष्म होता है, जो व्यवहार में बड़े बदलाव का कारण नहीं बनता।

कुछ मनोवैज्ञानिक मानते हैं कि पूर्णिमा की रात को अधिक रोशनी होने के कारण नींद के पैटर्न में बदलाव हो सकता है। नींद कम या हल्की होने से चिड़चिड़ापन, बेचैनी या भावनात्मक उतार-चढ़ाव महसूस हो सकता है।

इसके अलावा, सदियों से चली आ रही लोककथाएं और सांस्कृतिक धारणाएं भी हमारे अवचेतन मन को प्रभावित करती हैं। अगर हमें पहले से विश्वास है कि पूर्णिमा पर कुछ “असामान्य” होता है, तो हमारा मन उसी दिशा में अनुभव करने लगता है। इसे Placebo Effect भी कहा जाता है।


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