भारतीय सनातन परंपरा में सिर के पीछे रखी जाने वाली शिखा (चोटी) को केवल बालों का गुच्छा नहीं, बल्कि धर्म, अनुशासन और आत्मचेतना का प्रतीक माना गया है। वैदिक काल से ही विशेष रूप से ब्राह्मणों के लिए शिखा धारण करना धार्मिक पहचान और कर्तव्यबोध का संकेत माना जाता रहा है। वेद, गृह्यसूत्र और धर्मसूत्रों में इसका उल्लेख मिलता है, जहां शिखा व्यक्ति को ज्ञान, संयम और सामाजिक उत्तरदायित्व की याद दिलाने का माध्यम बताई गई है।

आध्यात्मिक दृष्टि से शिखा को सहस्रार चक्र के स्थान से जोड़ा जाता है, जिसे चेतना और आत्मबोध का केंद्र माना जाता है। योग और तंत्र परंपरा के अनुसार, शिखा मानसिक एकाग्रता और अनुशासन को मजबूत करने का प्रतीक है। धार्मिक अनुष्ठानों, यज्ञ और संध्या वंदन से पहले शिखा बांधने की परंपरा भी इसी कारण से चली आ रही है।

वैज्ञानिक दृष्टिकोण से आधुनिक चिकित्सा शिखा को उपचार का साधन नहीं मानती, लेकिन सिर के उस हिस्से के नीचे स्थित पीनियल ग्लैंड को ध्यान और जैविक लय से जुड़ा माना जाता है। कुछ आयुर्वेदिक और योग विशेषज्ञ मानसिक संतुलन पर इसके सकारात्मक मनोवैज्ञानिक प्रभाव की बात करते हैं।

शिखा बांधते समय विशेष मंत्रों का भी विधान है, जिससे व्यक्ति अपने संकल्प और कर्तव्यों को याद करता है। आधुनिक समय में शिखा अनिवार्य नहीं रही, लेकिन धार्मिक कर्मकांड और पारंपरिक जीवनशैली से जुड़े लोग इसे आज भी अपनी सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा मानते हैं।

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