हिंदू धर्मग्रंथों के अनुसार मां पार्वती पर्वतराज हिमवान और रानी मेना की पुत्री थीं। इसी कारण उन्हें “हिमालय की बेटी” और “गिरिजा” कहा जाता 

मां पार्वती का जन्म पवित्र हिमालय क्षेत्र में माना जाता है। पुराणों के अनुसार उनका बाल्यकाल हिमालय की शांत और आध्यात्मिक वादियों में बीता। यहीं से उनके जीवन में तप, साधना और भक्ति का बीज पड़ा।

कथाओं में वर्णित है कि पूर्व जन्म में वे सती थीं। पिता दक्ष के यज्ञ में अपमानित होने के बाद उन्होंने योगाग्नि में देह त्याग दी थी। अगले जन्म में पार्वती के रूप में अवतरित होकर उन्होंने पुनः भगवान शिव को पति रूप में पाने का संकल्प लिया।

 उद्देश्य से उन्होंने हिमालय की दुर्गम गुफाओं और वनों में वर्षों तक कठोर तपस्या की। अंततः उनकी साधना सफल हुई और शिव ने उन्हें स्वीकार किया। इस तरह हिमालय न केवल उनका जन्मस्थान, बल्कि उनकी तपस्थली भी रहा।


विवाह के बाद मां पार्वती भगवान शिव के साथ कैलाश पर्वत पर निवास करने लगीं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार कैलाश ही शिव-पार्वती का दिव्य धाम है, जहां से वे समस्त सृष्टि का संचालन करते हैं।

कैलाश पर्वत को केवल भौतिक स्थान नहीं, बल्कि आध्यात्मिक चेतना का केंद्र माना जाता है। हिंदू धर्म के साथ-साथ बौद्ध और जैन परंपराओं में भी इसका विशेष महत्व है। मान्यता है कि यहां शिव परिवार—गणेश और कार्तिकेय सहित—निवास करता है।


इस प्रकार मां पार्वती का मायका हिमालय और ससुराल कैलाश पर्वत माना जाता है। दोनों ही स्थान आज भी श्रद्धालुओं के लिए गहरी आस्था और आध्यात्मिक ऊर्जा के प्रतीक बने हुए हैं।

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