आज मकर संक्रांति और उत्तरायण का पर्व है। धार्मिक मान्यता के अनुसार उत्तरायण से देवताओं का दिन शुरू होता है। द्वापर युग में महाभारत युद्ध के बाद भीष्म पितामह ने इसी दिन अपने प्राण त्यागे थे। इसी अवसर पर भीष्म ने पांडवों को जीवन में सुख-शांति और सफलता पाने के महत्वपूर्ण सूत्र भी बताए थे।

यहाँ जानिए महाभारत के उस प्रसंग के बारे में, जिसमें भीष्म पितामह ने युधिष्ठिर को राजनीति, नेतृत्व और जीवन प्रबंधन के गुर सिखाए।


महाभारत युद्ध के बाद पांडवों का मन

महाभारत का युद्ध समाप्त हो चुका था और पांडव विजयी हुए थे। लेकिन युधिष्ठिर का मन विजय का उत्सव मनाने के लिए तैयार नहीं था।

  • अपने ही भाई, संबंधियों और गुरुओं का वध हो चुका था, जिससे वे दुखी थे।

  • हस्तिनापुर का सिंहासन उनका इंतजार कर रहा था, पर युधिष्ठिर इसे स्वीकार करने के लिए मानसिक रूप से तैयार नहीं थे।

  • उन्हें लग रहा था कि राज्य उन्हें सुख नहीं, बल्कि और अधिक बोझ देगा।


श्रीकृष्ण का मार्गदर्शन

श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर का दुःख समझा और उन्हें बताया:

“राजा बनना सम्मान नहीं, तपस्या है। सत्ता से केवल सुख की उम्मीद करना भ्रम है। संघर्ष, निर्णय, आलोचना और उत्तरदायित्व भी राजा के साथ आते हैं। बीते कल का बोझ और आने वाले कल की चिंता दोनों साथ लेकर चलना ही राजा का धर्म है।”

श्रीकृष्ण ने सुझाव दिया कि भीष्म पितामह के पास जाकर राजधर्म का ज्ञान लें, क्योंकि अनुभवी और निष्पक्ष मार्गदर्शन जीवन में सही दिशा देता है।


भीष्म पितामह का मार्गदर्शन

जब पांडव, द्रौपदी और श्रीकृष्ण भीष्म के पास पहुंचे:

  • भीष्म ने कहा: “मेरे शरीर में ऐसा कोई स्थान नहीं जहाँ तीर न हो, फिर भी आप आए हैं तो आज्ञा दीजिए।”

  • श्रीकृष्ण ने कहा: “युधिष्ठिर राजगद्दी संभालने जा रहे हैं, कृपया इन्हें राजधर्म का ज्ञान दीजिए।”

इसके बाद भीष्म ने युधिष्ठिर को शासन, न्याय, करुणा, संयम, कर्तव्य और लोक कल्याण का ज्ञान दिया।

ये उपदेश केवल राजा के लिए नहीं, बल्कि हर उस व्यक्ति के लिए है जो जीवन में किसी जिम्मेदारी का सामना करता है।

युधिष्ठिर ने इसके बाद राजपाठ स्वीकार किया।


प्रसंग से मिलने वाली सीख

1. जिम्मेदारी से भागें नहीं, उसे समझें

  • नया रोल डर पैदा करता है, पर डर को स्वीकार करके जिम्मेदारी निभाना सीखें।

  • जीवन में नेतृत्व, नौकरी या परिवार में बड़े रोल मिलने पर साहस के साथ जिम्मेदारी अपनाएं।

2. अनुभव और ज्ञान से बड़ा कुछ नहीं

  • श्रीकृष्ण ने स्वयं उपदेश देने की बजाय युधिष्ठिर को भीष्म के पास भेजा।

  • अनुभवी से मार्गदर्शन अमूल्य है।

3. बड़ों से संवाद बनाए रखें

  • जीवन में बुजुर्गों का अनुभव उलझनों को सरल करता है।

  • समय-समय पर उनसे मुलाकात करें।

4. पद नहीं, कर्तव्य महत्वपूर्ण है

  • राजा होना शक्ति नहीं, सेवा है।

  • जीवन में कोई भी पद अधिकार जताने के लिए नहीं, सेवा के लिए है।

5. भावनाओं को समझें

  • युधिष्ठिर का दुख उन्हें कमजोर नहीं बनाता, बल्कि संवेदनशील और न्यायप्रिय बनाता है।

  • भावनाओं को समझकर जीवन में संतुलन बनाना सीखें।

6. हर निर्णय का प्रभाव दूर तक जाता है

  • राजा का एक निर्णय हजारों जिंदगियों को प्रभावित करता है।

  • व्यक्तिगत और पेशेवर जीवन में भी निर्णयों का असर दूसरों पर पड़ता है।

7. सकारात्मक ऊर्जा का महत्व

  • भीष्म का शरीर असहाय था, पर उनकी उपस्थिति और शब्द पांडवों के लिए आशीर्वाद बने।

  • सकारात्मक संगति जीवन को दिशा देती है।

8. सीखते रहना जीवन का मूल संदेश

  • युधिष्ठिर ने राजा बनने से पहले सीखना चुना।

  • जीवन में कभी भी सीखना बंद न करें।


निष्कर्ष

उत्तरायण का दिन न केवल खगोलिक दृष्टि से शुभ है, बल्कि जीवन में सीखने और जिम्मेदारी निभाने का आदर्श भी देता है।

  • किसी भी बड़े काम या जिम्मेदारी को अपनाने से पहले अनुभवी से सलाह लेना आवश्यक है।

  • युधिष्ठिर और भीष्म पितामह का प्रसंग हमें यह सिखाता है कि ज्ञान, अनुभव, धैर्य और सकारात्मक ऊर्जा जीवन में सफलता और संतुलन की कुंजी हैं।

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