हिंदू धर्मग्रंथों में बृहस्पति को अत्यंत पूजनीय स्थान प्राप्त है। उन्हें देवताओं का गुरु यानी ‘देवगुरु’ कहा जाता है। लेकिन सवाल यह है कि आखिर बृहस्पति को यह उपाधि क्यों और किसने प्रदान की? इसका उत्तर हमें पुराणों में वर्णित एक रोचक कथा में मिलता है।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, बृहस्पति ज्ञान, नीति, धर्म और वेदों के महान ज्ञाता थे। उनकी बुद्धि और विवेक से प्रभावित होकर देवताओं ने स्वयं उन्हें अपना गुरु स्वीकार किया। कहा जाता है कि जब देवताओं और असुरों के बीच लगातार संघर्ष बढ़ रहा था, तब देवताओं को एक ऐसे मार्गदर्शक की आवश्यकता पड़ी जो उन्हें धर्म और नीति का सही मार्ग दिखा सके। उस समय देवराज इंद्र ने बृहस्पति को देवताओं का आचार्य नियुक्त किया।
पुराणों में वर्णन मिलता है कि बृहस्पति ने देवताओं को धर्म, नीति, संयम और कर्तव्य का ज्ञान दिया, जिससे देवताओं को असुरों पर विजय प्राप्त हुई। उनकी शिक्षाओं के कारण देवताओं में अनुशासन और एकता बनी रही। इसी कारण उन्हें ‘देवगुरु’ की उपाधि दी गई।
ज्योतिष शास्त्र में भी बृहस्पति ग्रह को ज्ञान, विवाह, संतान, धर्म और भाग्य का कारक माना जाता है। बृहस्पति की कृपा से व्यक्ति को विद्या, सम्मान और जीवन में सही दिशा मिलती है। यही कारण है कि धार्मिक और ज्योतिषीय दृष्टि से बृहस्पति को अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है।

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