रिपोर्ट - पवन शर्मा 
पारंपरिक त्योंहार छठ पर्व पूरी श्रद्धा के साथ मनाया 
सूरजगढ़. पारंपरिक त्योंहार छठ पर्व हिंदुओ में एक प्रमुख त्योंहार के रूप में मनाया जाता है। इसका मुख्य केंद्र पूर्वाचल क्षेत्र रहा है।छठ पर्व भारत और पडोसी देश नेपाल में बड़ी धूमधाम के साथ मनाया जाने वाला पर्व है।छठ की पूजा बिहार,झारखंड और उत्तर प्रदेश में अधिक लोकप्रिय है।छठ पूजा दीपावली पर्व के छठे एवं सातवे दिन कार्तिक शुक्ल पक्ष की षष्ठी और सप्तमी को की जाती है।छठ, षष्टी का अपभ्रंश है जिसका अर्थ हिन्दू पंचांग की छठवीं तारीख है।कार्तिक शुक्ल षष्टी को सूर्य षष्टी के नाम से भी जाना जाता है।छठ पर्व सूर्य की उपासना का पर्व है। शाश्त्रो में भी सूर्य को एक देवता का दर्ज दिया हुआ है। भारत में सूर्य की पूजा की परम्परा वैदिक काल से ही रही है ।
त्रेता युग से प्रारंभ हुआ पर्व 
छठ पर्व की पूजा की शुरुआत त्रेता युग से ही हो गई थी। धार्मिक ग्रंथो में बताया गया है की प्रभु श्रीराम द्वारा अधर्म पर धर्म की विजय यो कहे की लंका विजय के बाद रामराज्य की स्थापना के दिन कार्तिक शुक्ल षष्ठी को भगवान राम और माता सीता ने सूर्यदेव की आराधना करते हुए उपवास करते हुए छठी और सप्तमी को सूर्योदय के समय अनुष्ठान कर सूर्यदेव से आशिर्वाद प्राप्त किया।उसके बाद से ही इस त्योंहार की नींव पड़ी और तब से लेकर आजतक यह त्योंहार पूरी श्रद्धा के साथ मनाया जा रहा है। इसी के उपलक्ष्य में छठ पूजा की जाती है।
महाभारत काल में मनाया गया पर्व 
माना जाता है कि छठ या सूर्य पूजा महाभारत काल से की जाती रही है ।महाभारत काल में छठ पूजा की शुरुआत सूर्य पुत्र कर्ण ने की थी। कर्ण भगवान सूर्य का परम भक्त था। वह प्रतिदिन घंटों कमर तक पानी में ख़ड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देता था।सूर्य भगवान के आशीर्वाद के बाद ही वह एक महान योद्धा बना था । महाभारत में सूर्य पूजा का एक और वर्णन मिलता है।जिसमें यह भी कहा जाता है कि पांडवों की पत्नी द्रौपदी अपने परिजनों के उत्तम स्वास्थ्य की कामना और लंबी उम्र के लिए नियमित सूर्य पूजा करती थीं । इसका सबसे प्रमुख गीत 'केलवा जे फरेला घवद से, ओह पर सुगा मे़ड़राय काँच ही बाँस के बहंगिया, बहंगी लचकत जाए' है।
ऊर्जा का सबसे बड़ा स्त्रोत                                                                                                                        सूर्य ऊर्जा का सबसे बड़ा स्रोत है। इस कारण हिन्दू शास्त्रों में सूर्य को भगवान मानते हैं।सूर्य के बिना मानव जीवन की कल्पना भी व्यर्थ है।मानव जीवन के लिए इनका रोज उदित होना जरूरी है । कुछ इसी तरह की परिकल्पना के साथ पूर्वोत्तर भारत के लोग छठ महोत्सव के रूप में इनकी आराधना करते हैं ।दीपावली के छठे दिन से शुरू होने वाला छठ का पर्व चार दिनों तक चलता है । इन चारों दिन श्रद्धालु भगवान सूर्य की आराधना करके वर्षभर सुखी, स्वस्थ और निरोगी होने की कामना करते हैं । चार दिनों के इस पर्व के पहले दिन घर की साफ-सफाई की जाती है ।वैसे तो छठ महोत्सव को लेकर तरह-तरह की मान्यताएँ प्रचलित हैं, लेकिन इन सबमें प्रमुख है साक्षात भगवान का स्वरूप सूर्य से आँखें मिलाने की कोशिश भी कोई नहीं कर सकता। ऐसे में इनके कोप से बचने के लिए छठ के दौरान काफी सावधानी बरती जाती है। इस त्योहार में पवित्रता का सर्वाधिक ध्यान रखा जाता है।
छठी माता की होती है पूजा 
छठ पर्व के दौरान छठी माता का पूजन होता है। मान्यता है कि पूजा के दौरान कोई भी मन्नत माँगी जाए वो जरूर पूरी होती। जिनकी मन्नत पूरी होती है, वे अपने वादे अनुसार पूजा करते हैं । पूजा स्थलों पर लोट लगाकर आते लोगों को भी देखा जा सकता है ।
संतान प्राप्ति के लिए की जाती है पूजा                                                                                                 पौराणिक कथाओं के जरिये बताया गया है की छठ पूजा संतान प्राप्ति  भी की जाती है। पौराणिक मान्यताओ के अनुसार जब एक साधु की हत्या का प्रायश्चित करने के लिए महाराज पांडु अपनी पत्नी कुंती और माद्री के साथ वन में दिन गुजार रहे थे।पुत्र की प्राप्ति की इच्छा से कुंती ने सरस्वती नदी में सूर्य की उपासना की थी उसके बाद उन्हें पुत्र की प्राप्ति हुई थी तब से संतान प्राप्ति के लिए छठ पर्व का विशेष महत्व है।    
बिहारी समुदाय ने मनाया पर्व 
सूरजगढ़ में भी विभिन्न स्थानों पर रहने वाले बिहारी समुदाय के लोगो ने सोमवार को छठ पूजा कर त्योंहार मनाया। महिलाओ ने कृत्रिम तालाब बनवाकर उसमे खड़े होकर ठंडे जल से स्नान करते हुए सूर्य देव को अरख देते हुए पारंपरिक रूप से यह त्योंहार मनाया।इस दौरान महिलाओ ने सूर्य देव की पूजा करते हुए अपने परिवार और बच्चो की लंबी उम्र की दुआ मांगी। 


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