एक बार गंगाजी के पावन तट पर विराजमान श्री सूत-जी महाराज से शौनकादी ऋषियों ने निवेदन किया- "हमे किसी श्रेष्ट व्रत का विधान बता दे. श्री सूत-जी महाराज  बोले कि- ऋषिगण! अपने बहुत सुन्दर प्रश्न किया है. एक बार महर्षि वेदव्यास जी ने प्रथापुत्र युधिष्ठिर को गुप्त संपत्तियों के निधि स्वरुप तथा नष्ट राज्य की प्राप्ति करने वाला श्री हनुमान-जी का व्रत कहा था. उन्होंने बताया कि यह व्रत भगवान श्री कृष्ण ने द्रोपदी के लिए कहा था.  द्रोपदी ने हनुमान व्रत का आरंभ किया और उनका डोरा गले में बांध लिया. किसी समाया अर्जुन ने उस सोरे को बंधा   देखा तो बोले- "यह व्यर्थ का डोरा क्यों बांधा है ?" द्रोपदी ने मधुर शव्दों में कहा- "भगवान श्री कृष्ण के निर्देशानुसार मैं हनुमान व्रत करती हुआ. यह डोरा उसी का है. यह सुनकर अर्जुन क्रुद्ध हो  गए और बोले- "अरे! वह बन्दर तो हमारे रथ की ध्वजा पर निरंतर लटका रहता है, वह तुम्हे क्या दे सकता है? श्री कृष्ण भी तो कपटी है, उन्होंने हसी में ऐसा कह दिया होगा. अब तुम इस डोरे को उतारकर फेक दो." द्रोपदी को अर्जुन की आज्ञा माननी पड़ी. उसने उस डोरे को गले से खोलकर उधन में सुरक्षित रखा दिया. हे  युधिष्ठिर! हनुमान-जी के डोरे का परित्याग ही तुम्हारी वर्तमान विपित्त का कारण है. उसी के फलस्वरूप तुम्हारा प्राप्त ऐश्वर्य सहसा नष्ट हो गया. उस डोरे में तेरह ग्रंथियां  है, इसलिए तुम्हे तेरह वर्ष का वनवास भोगना पड़ा. यदि उस डोरे का परित्याग न किया तो यह तेरह वर्ष सुखपूर्वक ही व्यतीत होते.
जब व्यास-जी यह चर्चा कर रहे थे तब द्रपादी भी वहां मौजूद थी. उसने स्वीकार किया कि- "भगवन श्री वेदव्यास का कथन सत्य है." व्यास-जी पुन: बोले- "हे युधिष्ठिर! यदि तुम इस व्रतकथा को सुनना चाहते हो तो ध्यानपूर्वक सुनो.-
जब श्री सीता-जी की खोज करते हुई भगवन रामचंद्र-जी अपने अनुज सहित ऋष्यमूक पर्वत पर पधारे तब उन्होंने सुग्रीव के साथ हनुमान-जी को भी देखा और तब हनुमान-जी ने उनके साथ मित्रता स्थापित की और बोले-" हे महाबोहो श्री रामचंद्र-जी मैं आपका कार्य करने को आतुर हूँ. आपका भक्त हुआ. पहले इन्द्र ने मेरी हनु पर व्रज से प्रहार किया था इसीलिए पृथ्वी पर मैं हनुमान नाम से विख्यात हुआ. उस समय मेरे पिता वायु, क्रोध में यह कहरे हुए अद्रश्य हो गए कि जिसने मेरे पुत्र को मारा है. उसे नष्ट कर दूगा. तदनन्तर ब्रह्मा देवताओ ने प्रकट होकर कहा- हे अंजनीपुत्र! तुम्हारे लिए इस वज्र का प्रहार व्यर्थ है और तुम अमित पराक्रमी होकर अपने व्रत के नायक होकर राम कार्य को करो. तुम्हारे इस व्रत के करने वाले की सभी कामनाए  पूर्ण होगी. इस व्रत का अनुष्ठान पहले श्री राम चन्द्र-जी ने भी किया था. यह कहकर देवगण चले गए. अब हे नाथ! हे रामचंद्र जी! आप इस व्रत को अवश्य कीजिए."
हनुमान जी की बात का समर्थन आकाशवाणी ने भी किया. तब श्री राम ने हनुमान-जी से व्रत का विधान पूछा. तब हनुमान जी बोले- "जब मार्गशीर्ष मास के शुक्लपक्ष में तेरह घटी त्रयोदशी व अभिजित नक्षत्र हो तब पीले डोरे में तेरह गत लगाकर उसे कलश में रखे और फिर 'ॐ   नमो भगवते वायुनान्दनाय' मंत्र से मेरा आवाहन तथा पीले चन्दन, पीले पुष्प और अर्चानोचित सामग्री से मेरा पूजन करे. पूजन में ॐकार मंत्र द्वारा षोडशोपचार करने चाहिए. गेहूं के आटे के तेरह मालपुआ, तांबूल व दक्षिणा ब्राह्मण को दे तथा भोजन भी कराए. यह व्रत तेरह वर्ष पूर्ण होने तक नियमपूर्वक करे तथा तेरह वर्ष बाद विधिवत उद्यापन करे. "इस प्रकार हनुमान जी ने कहा. यह व्रत लक्ष्मण जी, विभीषण, सुग्रीव व श्री राम चन्द्र जी भी किया था. इस व्रत का साधन करने वाले साधक की शिर हनुमान जी सहायता करते है.   हे युधिष्ठिर! इस मार्गशीर्ष मास में तुम भी इस व्रत को करो तो तुम्हे राज्य की पुन: प्राप्ति हो सकती है.
व्यास जी द्वारा व्रत की ऐसी महिमा सुनकर समुद्र तट पर रात्रि व्यतीत करने के पश्चात् दुसरे दिन  युधिष्ठिर ने व्यास जी के समाखा ही द्रोपती के साथ यह व्रत, प्यास मिया घ्रात्ता हवि से होम तथा  'ॐ   नमो भगवते वायुनान्दनाय'  से श्री हनुमान जी का आवाहन पूजन किया. इसके फलस्वरूप युधिष्ठिर को उसी वर्ष राज्य की पुन: प्राप्ति हो गई. इसलिए हे ऋषि-गण! अप भी इस व्रत को करसे सफल मनोरथ को प्राप्त कर सकते है. तब उन ऋषियों ने भी इस श्री हनुमान व्रत को किया.
     इस हनुमान-व्रत सबंधी कल्प का पथ करने, सुनने तथा सुनाने से सभी मनोरथ पूर्ण होते है.
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